फिरंगियों की गोली के आगे लोगों ने तान लिया था सीना
महराजगंज। घुघली क्षेत्र का विशुनपुर गबडुवा गांव का शहीद स्थल आज भी ब्रिटिश हुकूमत के क्रूरता की याद दिलाता है। शहीद स्थल पर उन अमर सपूतों का नाम अंकित हैं, जिन्होंने देश की आजादी के लिए प्राणों की आहुति दे दी। गांव के बुजुर्ग उस वक्त को याद कर भावुक हो जाते हैं। स्वतंत्रता दिवस करीब आते ही शहीद स्थल पर कार्यक्रम का दौर शुरू है। 15 अगस्त को यहां विशेष कार्यक्रम आयोजित कर अमर सपूतों को याद किया जाएगा।
पूर्व प्राचार्य डॉ. पीआर गुप्ता द्वारा लिखित ‘पूर्वांचल के गांधी’ नाम पुस्तक में विशुनपुर गबडुआ के इतिहास को दर्शाया गया है। पुस्तक में अंकित तथ्यों के अनुसार विशुनपुर गबडुआ गांव के लोगों ने ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ बगावत की शुरुआत की थी। सात अगस्त 1942 की रात विशुनपुर गबडुवा गांव के लिए मातम वाली रात साबित हुई। यह इतिहास के पन्नों में दर्ज है। तत्कालीन कलेक्टर ईडी बी मास की दमनात्मक नीति के तहत स्थानीय जमींदारों की अगुवाई में अंग्रेजी सिपाहियों ने विशुनपुर गबडुवा के क्रांतिकारियों को कुचल देने की योजना बनाई। जमींदारों व ब्रिटिश हुकूमत के भय से कई क्रांतिकारी जंगलों में छिप थे। इन क्रांतिकारियों को अंग्रेजी हुकूमत के भय से कोई शरण नहीं देता था, लेकिन इनमें जुनून इतना था कि ये छिप-छिपकर आंदोलन तेज करते रहे।
बैठक की भनक लगते ही चली थीं गोलियां
प्रोफेसर शिब्बन लाल सक्सेना 26 अगस्त 1942 को विशुनपुर गबडुवा गांव में बैठक करने वाले थे। इसकी भनक कलेक्टर ईडी बी मास को लग गई। इसके बाद पूरे गांव को कुचल देने की योजना बनाई गई। शिब्बन लाल सक्सेना बैठक करके कुछ क्रांतिकारियों के साथ रात में कहीं चले गए। अंग्रेजी हुकूमत पूर्व योजना के अनुसार 27 अगस्त 1942 को सुबह करीब 5 बजे पूरे दमखम के साथ गांव की नाकेबंदी कर दी। गांव के तमाम महिलाएं-पुरुष व बच्चे भयभीत होकर घर छोड़कर भाग निकले, जो बचे वे अंग्रेजों से जूझ पड़े। फलस्वरूप गांव के सूखराज ने सिपाहियों को ललकारा और गांव छोड़ कर भाग जाने को कहा । इस पर एक सिपाही ने सूखराज के सीने में गोली मार दी। सूखराज जमीन पर गिर पड़े। इस घटना को देख क्रांतिकारी झिनकू को भी विरोध करने पर गोली मार दी गई। इससे में अफरातफरी मच गई। गांव वालों का आक्रोश देख सिपाहियों ने क्रांतिकारी जनकराज, नंगई, तिलकधारी, रामधारी, शिवदत्त, सरजू, हरिबंश, रामजतन, त्रिलोकी, रामदेव, आदि को जेल में डाल दिया। 29 सितंबर 1942 को इन लोगों को एक एक वर्ष की सजा सुनाई गई। यह क्रांतिकारी जेल में सजा काट ही रहे थे कि पुन: अंग्रेजों ने 1943 में गांव पर दलबल के साथ हमला कर दिया।