फरेंदा। पितृपक्ष मेें लोग अपने पितरों की शांति के लिए पिंडदान व तर्पण कर रहे हैं, लेकिन तस्वीर का दूसरा पहलू बेहद भयावह है। जीवन के अंतिम समय में कई बुजुर्ग अपनों की बेरुखी से परिवार की खुशियों से दूर हैं। घर में बेटे हैं, बहू हैं, भरा पूरा परिवार है, लेकिन परिवार की बेरुखी के कारण जीवन के अंतिम समय में वे परिवार को छोड़कर वृद्धाश्रम में रह रहे हैं। फरेंदा क्षेत्र के गनेशपुर में स्थित आधारशिला वृद्धाश्रम में कुछ बुुजुर्गों से उनके बारे में जाना तो उनका दर्द जुबां पर आ गया। उनका कहना था कि जीते जी जो बेटे बाप को सम्मान नहीं देते वे मरने के बाद पिंडदान क्यों करते हैं। बृजमनगंज क्षेत्र के 67 वर्षीय प्रताप ने बताया कि उनके तीन बेटे व तीन बेटियां हैं। खेती करके पढ़ाया लिखाया, लेकिन परिवार में उचित देखभाल न होने के कारण चार माह से वृद्धाश्रम में रह रहे हैं।
शिकारपुर के सूरजमन (72) करीब तीन वर्ष से वृद्धाश्रम में रह रहे हैं। उनका एक बेटा है। जो बुढ़ापे की लाठी था। परिवार में हमेशा कलह होती रहती थी। इससे तंग आकर दंपती आश्रम में रहने को विवश हैं। बेटा देखने भी नहीं आता है। संतकबीरनगर निवासी फूलचंद (70) करीब चार माह से वृद्धाश्रम में हैं। एक बेटा है, जो प्रताड़ित करता रहता था। विवाद होने के कारण घर छोड़ कर यहां चला आया। घुघली के दयानंद (83) करीब दो वर्ष से वृद्धाश्रम में रह रहे हैं। पहले दुकान चलाकर गुजर-बसर करते थे। परिवार में दो बेटा व दो बेटी हैं। परिवार में कलह थी। उचित देखभाल भी नहीं हो रही थी। जिससे आजिज आकर घर छोड़ कर चला आया।