ललितपुर। उत्तम आकिंचन दिवस पर आचार्य आर्जव सागर महाराज ने कहा कि चाहे कर्म हों या शरीर हो या पदार्थ हो वे सब आत्मा से परे हैं। कर्मों को मन वचन पूर्वक त्यागने की भावना ही आकिंचन है। ज्ञानपूर्वक किया गया त्याग ही वास्तविक त्याग है।
आचार्य आर्जव सागर महाराज ने पर्युषण पर्व पर श्री पाश्र्वनाथ दि. जैन मंदिर क्षेत्रपाल परिसर में धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि मैं- मेरा और तू- तेरा की सूक्ष्म परणति भी आत्मा को भारी बनाती है। खाली और हल्केपन की इस उधर्वगामी यात्रा में आकिंचन अकेली आत्मा ही मुक्ति को पाती है। उन्होंने कहा सब कुछ त्यागने के बाद भी मन मैं जो मैं और मेरे पन की संकल्प विकल्प की परणिति रहती है, वह परम ब्रह्म की लीनता में बाधक है और इसका त्याग ही उत्कृष्ट त्याग आकिंचन है। इसके पहले सोमवार की सुबह आचार्य एवं संघस्थ मुनि महान सागर ,मुनि भाग्य सागर, मुनि महत्त सागर, मुनि विलोक सागर, मुनि विवोध सागर, मुनि विदित सागर, मुनि विभोर सागर महाराज के समक्ष तत्वार्थ सूत्र का वाचन पूजा सिंघई एवं अंशिका जैन द्वारा हुआ। इसमें अर्घ प्रेमचंद सुनील कुमार सतरवांस द्वारा अर्पित किए गए। प्रारम्भ में आचार्य विद्यासागर महाराज एव आचार्य आर्जव सागर महाराज का पूजन किया गया। मध्यान्ह में आचार्य ने संघस्थ मुनि को जैन धर्म का मर्म तत्वार्थ सूत्र के वाचन द्वारा बताया।
इधर आदिनाथ मंदिर नईबस्ती में शिष्य मुनि विनिश्चल सागर महाराज ने कहा आकिंचन्य का ज्ञान ही तत्व का सार है। संसार कुछ भी नहीं, ऐसा समझकर आत्मा में लीन होना ही आकिंचन्य है और यही मुक्ति का मार्ग है। मुनि ने कहा त्याग करने के बाद इतना अवश्य ध्यान रखें कि दृष्टि कहीं उलझना नहीं चाहिए क्योकि त्याग से आकिंचन का बोध होना चाहिए। उधर, बाहुबलि नगर में विराजमान आचार्य आर्जव सागर महाराज की प्रभावक शिष्या आर्यिका प्रतिभामति और आर्यिका सुयोगमति माताजी ने कहा मैं आकिंचन्य हूं, यह प्रतीत कर लो तो तीन लोक के अधिपति बन जाओगे। योगियों द्वारा प्राप्त परमात्मा का यही रहस्य है, जो इस रहस्य को जान लेते हैं। वह वाहरी वैभव में नहीं फंसते। अपने आप में स्वामित्व का भाव नहीं रखना और संसार की नश्वरता और आत्मा की अमरता को जानने वाला ही ममत्व- ममकार पर विजय पा सकता है।
मैं’ और ‘मेरे पन’ का त्याग ही उत्तम आकिंचन धर्म : मुनि सुप्रभसागर
मसौरा। मसौरा के दयोदय पशुसंरक्षण केन्द्र गौशाला में विराजमान श्रमण मुनि सुप्रभ सागर ने कहा आत्म स्वभाव की प्राप्ति में त्याग को आवश्यक है ज्ञानी जन विशय, राग, कषायों से डरते हैं, ये त्याग नहीं और अज्ञानीजन राग का आवरण बनते हैं, वे त्याग से डरते हैं। त्याग को अमृत तत्व को प्राप्त कराने में सहायक बताते हुए परिग्रह को दुख का कारण बताया। इसके पूर्व सुबह मुनि जी के सानिध्य में ऑनलाइन ध्यान कराया गया। संघस्थ मुनि प्रणत सागर ने श्रावकों द्वारा की गई जिज्ञासाओं को रखा जिसका निर्देशन ब्रह्मचारी साकेत भैया ने किया।
नगर में चतुर्मासरत दयोदय गौशाला मसौरा में विराजमान श्रमणाचार्य 108 विशुद्ध सागर महाराज के शिष्य श्रमणरत्न मुनि 108 सुप्रभ सागर महाराज व मुनि प्रणत सागर महाराज के पावन सान्निध्य में दस दिवसीय दसलक्षण महापर्व के अवसर पर ऑनलाइन चल रहे दस दिवसीय समय सारोपासक साधना संस्कार शिविर में पर्व के नौवे दिन सोमवार को उत्तम आकिंचन्य धर्म आस्था पूर्वक मनाया गया। मुनि सुप्रभ सागर महाराज ने श्रद्धालुओं को ऑनलाइन संबोधित करते हुए कहा कि आकिंचन्य धर्म आत्मा की उस दशा का नाम है, जहां पर बाहरी सब छूट जाता है। लेकिन, आंतरिक संकल्प विकल्पों की परिणति को भी विश्राम मिल जाता है। बाहरी परित्याग के बाद भी मन में ‘मैं’ और ‘मेरे पन’ का भाव निरंतर चलता रहता है, जिससे आत्मा बोझिल होती है और मुक्ति की ऊर्ध्वगामी यात्रा नहीं कर पाती। मुनि प्रणत सागर ने कहा कि जिंदगी की अर्थी में कोई कंधा देने वाला नहीं मिलेगा। इस शरीर से प्राण निकलने पर समाज के चार लोग आकर के फिर भी कंधा दे देंगे। राम नाम सत्य है कहने वाले मिल जाएंगे, लेकिन जिंदगी की अर्थी में कंधा देने के लिए तो तुम्हें खुद ही तैयार होना पड़ेगा। यह आकिंचन्य धर्म हमें इसी गहराई में ले जाता है। कोई नहीं किसी का साथी, सारी यात्रा एकाकी है।