महरौनी (ललितपुर)। जैन समाज के लोगों के लिए मंगलवार का दिन आस्था, श्रद्धा और भक्ति से सराबोर रहा। आर्यिका रत्न विज्ञान मति सासंघ के सानिध्य में और विधानाचार्य अंकित सहज एवं विजय लखनादौन के दिशा निर्देश में क्षेत्रपाल परिसर में चल रहे श्री कल्पद्रुम महामंडल विधान एवं विश्व शांति महायज्ञ में सुबह जिन अभिषेक पूजन, पंचधाम विधान और दोपहर में पिच्छिका परिवर्तन समारोह का आयोजन किया गया। इस मौके पर श्रावक श्राविकाओं ने पिच्छिका की शोभायात्रा निकाली और भक्ति संगीत पर जमकर नृत्य किया। पिच्छिका को बडे़ आकर्षण ढंग से सजाया गया और उसको गाजे बाजों के साथ कार्यक्रम स्थल तक लाया गया। कार्यक्रम का शुभारंभ रिद्धि सराफ ने मंगलाचरण कर किया। प्रसिद्ध कवि चंद्रसेन भोपाल ने अपने काव्य पाठ से सबको मोहित कर दिया। कार्यक्रम में नगर पंचायत अध्यक्ष कृष्णा सिंह ने आर्यिका संघ को श्रीफल अर्पित कर आशीर्वाद लिया।
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साधन से नहीं साधना से ही मुक्ति संभव- आर्यिका विज्ञान मति
धर्म सभा को संबोधित करते हुए आर्यिकारत्न विज्ञानमति माताजी ने कहा कि साधन से नहीं साधना से ही मुक्ति मिल सकती है। संयम का प्रतीक है पिच्छी और पिच्छी साधु के संयम का उपकरण है। इसके पांच गुण होते हैं। साधु हमेशा अपने पास पिच्छी रखते हैं। संयम में सहायक होती है। पिच्छी आचरण-संयम में परिवर्तन का बोध कराती है। वहीं, आर्यिका आदित्य मति माताजी ने कहा कि जिस प्रकार पिच्छिका का परिवर्तन हो रहा है उसी प्रकार संसार भी परिवर्तनशील है। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवन में मोक्ष मार्ग पर चलने के लिए जीवन में परिवर्तन लाना चाहिए।
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क्या है पिच्छिका, क्यो मोर पंख की बनी है
दिगंबर साधु की पहचान मोर पंख की पिच्छी है। पिच्छी मोर द्वारा छोड़े गए पंखों से निर्मित है। यह इतनी मुलायम होती है कि इससे किसी जीव को हानि नहीं पहुंचती। संत की पिच्छी प्राप्त होना सौभाग्य की बात है। मोर ही अकेला एक ऐसा प्राणी है, जो ब्रह्मचर्य को धारण करता है। जब मोर प्रसन्न होता है तो वह अपने पंखो को फैला कर नाचता है और जब नाचते-नाचते मस्त हो जाता है, तो उसकी आंखों से आंसू गिरते हैं और मोरनी इन आंसू को पीती है इससे ही गर्भ धारण करती है। मोर में कहीं भी वासना का लेश भी नहीं है। आर्यिका विज्ञानमति माताजी ने कहा कि जिसके जीवन में वासना नहीं, भगवान उसे अपने शीश पर धारण कर लेते हैं। कार्तिक मास में स्वयं ही मयूर अपने पंखों को छोड़ देते हैं, उन्हें ही ग्रहण कर यह पिच्छिका बनाई जाती है। दीक्षा के समय आचार्य एवं आर्यिका इस संयम के उपकरण रूप पिच्छिका को जीव दया पालन हेतु शिष्यों को देते हैं। पिच्छिका में पांच गुण होते हैं। जिसमें धूलि को ग्रहण नहीं करना, पसीने से मलिन नहीं होना, मृदुता, सुकुमारता और लघुता शामिल हैं।
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पिच्छी भेंटकर धारण किया संयम व्रत
पिच्छी संयम का प्रतीक है और आर्यिका संघ को नई पिच्छी देने और पुरानी पिच्छी लेने के लिए संयम व्रत को धारण करना पड़ता है। आर्यिका रत्न विज्ञानमति माताजी को नई पिच्छी देने का सौभाग्य बह्मचारिणी दीदी को मिला। वहीं पुरानी पिच्छी रागिनी राजीव सिंघई ने प्राप्त की। आर्यिका आदित्य मति को नई पिच्छी मंगल ग्रुप ने दी और पुरानी पिच्छी अंजना धर्मेंद्र मिठया ने प्राप्त की। आर्यिका गरिमामति को नई पिच्छी मंगल ग्रुप ने दी और पुरानी पिच्छी चंद्रप्रभा अभिनंदन सिंघई को मिली। आर्यिका शरद मति की पुरानी पिच्छी ममता अरविंद पठा को मिली। आर्यिका चरणमति की पुरानी पिच्छी सितारा अजित खंजाची, आर्यिका शरण मति माताजी की पुरानी पिच्छी राजेंद्री हेमंत सिंघई, आर्यिका सुवीर मति की पुरानी पिच्छी दीप्ति विनीत सतभैया, आर्यिका सुयश मति की पुरानी पिच्छी निर्मला अखिलेश मलैया, आर्यिका उदितमति माता की पुरानी पिच्छी अर्चना, प्रमोद और आर्यिका रजतमति माता की पुरानी पिच्छी रानी डॉ. देवेंद्र सेठ ने प्राप्त की।
नगर पंचायत अध्यक्ष शास्त्र भेंट करते हुए- फोटो : LALITPUR
कार्यक्रम में उपस्थित जन समूह- फोटो : LALITPUR