ललितपुर। आर्यिका रत्न 105 आदर्शमति माता ने कहा कि शिक्षा अर्थकारी नहीं, परमार्थकारी होनी चाहिए। शिक्षक एक कुंभकार की तरह होता है। शिक्षक बच्चों को संस्कार युक्त शिक्षा दें, तो बच्चे भी संस्कारवान बनेंगे। वह रविवार को आचार्य श्रेष्ठ 108 विद्यासागर महामुनिराज के प्राकट्योत्सव समारोह के चार दिवसीय कार्यक्रम गुरू गरिमा गान महोत्सव के अंतर्गत शिक्षक एवं शिक्षिका अधिवेशन को संबोधित कर रहीं थी।
शहर के स्टेशन रोड स्थित पार्श्वनाथ दिगंबर जैन क्षेत्रपाल मंदिर में जैन शिक्षक सामाजिक समूह के संयोजन में हुए कार्यक्रम में आर्यिका 105 दुर्लभमति माताजी ने कहा कि वर्तमान परिवेश में आचार्य विद्यासागर जी प्रतिभास्थली स्थापित कराकर बालिका शिक्षा प्रणाली में सुधार के प्रयास कर रहे हैं।
संजीव जैन ने कहा कि भौतिक के साथ आध्यात्मिक उन्नति भी राष्ट्र निर्माण प्रक्रिया में निहित रहती है। अमृता लोहिया ने कहा कि मनुष्य जन्म से शाकाहारी है, लेकिन आधुनिकता के चलते मनुष्य पाश्चात्य संस्कृति को अपनाकर शाकाहार से दूर होता जा रहा है। जैन पंचायत समिति के अध्यक्ष इंजीनियर अनिल जैन अंचल ने कहा कि शिक्षक-शिक्षिकाएं विद्यालयों में बच्चों को अहिंसा, जीव दया, परस्परोग्रहो जीवानाम, मानवीय शिक्षा के साथ बच्चों को शाकाहार का संदेश देकर शिक्षण कार्य कराएं।
विशाल जैन पवा ने कहा वर्तमान समय में बिखरते परिवार समाज की सबसे ज्वलंत समस्या है। हम अपने अधिकार तो भलीभांति जानते हैं लेकिन अपने दायित्वों और कर्त्तव्यों को हर पल भूल जाते हैं। मोहिनी जैन ने गुरू उपकार पर पंक्तियां प्रस्तुत कर गुरू महिमा का गुणगान किया। सचिन जैन शास्त्री ने कहा कि मनुष्य सात्विक जीवन शैली से दूर होता चला जा रहा है। वर्तमान परिवेश में व्यक्ति स्वभाव को छोड़कर विभाव की ओर चला जा रहा है। दीप्ति जैन ने बिखरते हुए परिवार को लेकर पंक्तियां प्रस्तुत की। इस मौके पर अतिथियों का सम्मान स्मृति चिन्ह, शाल ,श्रीफल देकर किया गया। इस मौके पर अक्षय टडैया, गुलाबचंद्र जैन, अशोक जैन, डॉ.शिखरचंद्र सिलौनिया, जैन शिक्षक सामाजिक समूह के अध्यक्ष जितेंद्र जैन, अंतिम जैन, देवेंद्र जैन, सत्येंद्र जैन, जितेंद्र जैन, शीलचंद्र शास्त्री, राहुल जैन, सत्येंद्र जैन मौजूद रहे।
कार्यक्रम में नृत्य करती नन्ही बालिका- फोटो : LALITPUR