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विंध्याचल की गोद में स्थित चंडी मंदिर देख रहा विकास की राह

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डोंगराखुर्द (ललितपुर) अफसरों और पर्यटन विभाग की अनदेखी से नाराहट क्षेत्र के विंध्याचल पर्वत की पहाड़ियों पर स्थित प्राचीन चंडी माता मंदिर और आल्हा उदल कचहरी रख-रखाव के अभाव में खंडहर होती जा रही है। पहाड़ी के किनारे कच्चे पथरीली रास्ते से होते हुए यहां तक जाना पड़ता है, लेकिन बारिश में इस स्थान पर जाने के लिए रास्ते बंद हो जाते हैं। यहां रुकने की भी व्यवस्था नहीं है।
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विंध्याचल पर्वत की पर स्थित चंडी मंदिर तक पहुंचने के लिए कंकरीला पथरीला पगडंडी के रूप में बना हुआ है। मार्ग कच्चा है। अच्छा रास्ता न होने की वजह से पर्यटकों को यहां जाने में दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। यहां आने वालों के लिए पेयजल और ठहरने की व्यवस्था तक नहीं है। यह स्थान पुरातत्व विभाग द्वारा संरक्षित है लेकिन हकीकत में धरातल पर यहां कुछ नहीं है। इलाकाई लोगों के मुताबिक कई प्राचीन मूर्तियां यहां टुकड़ों में बिखरी पड़ी हैं, इनका संरक्षण पुरातत्व विभाग द्वारा नहीं किया जा रहा है जिसके कारण मूर्तियां धीरे-धीरे करके गायब होती जा रही हैं।
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चंडी माता मंदिर में धड़ व पैरों और जागेश्वरी चंदेरी में होती है सिर की पूजा
डोंगराखुर्द। विंध्याचल पर्वत की तलहटी से स्थित करीब सौ फीट की ऊंचाई पर चंडी माता मंदिर स्थापित है। यह शक्ति की देवी माता चंडी को समर्पित है। मंदिर सुंदर प्राकृतिक घने जंगलों के परिवेश और पहाड़ियों के बीच स्थित है। मान्यता के अनुसार मां चंडी अपने मठ की छत तोड़कर चंदेरी मध्य प्रदेश के पर्वत की तलहटी में पहुंच गई थीं जहां उन्हें जागेश्वरी माता के नाम से जाना जाता है। ऐसे में नाराहट में चंडी माता के धड़ एवं पैरों की पूजा होती है, जबकि जागेश्वरी चंदेरी में सिर की पूजा होती है। मठ तोड़ने के साक्ष्य यहां मौजूद है, किंतु वर्तमान में स्थानीय लोगों ने मंदिर पर सीमेंट की छत का निर्माण करा दिया है। मंदिर के आसपास जंगलों में पत्थर की मूर्तियां बिखरी पड़ी हैं जो की बहुत ही प्राचीन बतलाई जा रहीं हैं।
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मंदिर परिसर में बहता है प्राकृतिक झरना
डोंगराखुर्द। मंदिर का रास्ता भले ही दुर्गम हो किंतु श्रद्धालुओं की आस्था उन्हें प्राकृतिक वातावरण में खींच ले जाती है। मंदिर परिसर में प्राकृतिक झरना बहता है, बरसात के तीन महीने यह स्थान सैलानियों का पिकनिक स्पॉट बन जाता है।
मंदिर से महज 200 मीटर की दूरी पर स्थित आल्हा ऊदल की कचहरी के नाम से प्रसिद्ध पत्थर का किला है। स्थानीय लोगों ने बताया कि यहां पर आल्हा ऊदल प्राचीन समय में जनसुनवाई करते थे एवं लोगों की समस्याओं का निस्तारण करते थे। वर्तमान में यह किला पर्यटन विभाग की उपेक्षा के कारण खंडहर बन चुका है। किले के पास ही एक जलकुंड है जहां वर्ष भर पानी बना रहता है इस कुंड में जंगल की पशु पक्षी पानी पीने के लिए आते दिख जाते है साथ ही यहां पर आने वाले पर्यटक भी इसी कुंड के पानी का उपयोग करते है।
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विंध्याचल पर्वत पर स्थित प्राचीन चंडी मंदिर तक पहुंचने के लिए कच्चा रास्ता है जिससे लोगों को का असुविधा होती है। सड़क बनना बहुत जरूरी है। सड़क बनने से सैलानियों के लिए सुविधा हो जाएगी। हरेंद्र शाह प्रधान नाराहट।
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चंडी माता चंदेरी में जोगेश्वरी के नाम से प्रसिद्ध है। वर्षों पहले चंडी माता के दरवाजे पर पहरेदार खड़े थे इससे मां अपना मठ तोड़कर चंदेरी पहुंच गईं। इसके प्रमाण हैं यहां पर आधा धड़ रह गया और चंदेरी में सिर्फ चेहरा है। सुनील वैद्य।
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बरसात के दिनों में लोग ज्यादातर मंडी मंदिर जाते है। यहां का खूबसूरत नजारा देखने के लिए काफी लोग आते हैं। झरने का बहता पानी चारों ओर हरे भरे जंगल व मनोहारी सुंदर दृश्य दिखाई पड़ते हैं, सैलानी खूब आनंद लेते हैं। सोनू सोनी
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नाराहट क्षेत्र में यह प्रसिद्ध मंदिर है लेकिन यहां सड़क, पानी बिजली और ठहरने के कोई इंतजाम नहीं है इस ओर शासन प्रशासन पुरातत्व विभाग को इस ओर ध्यान देना चाहिए। ताकि यहां पर्यटन विकसित हो सके। डॉ. विवेक पस्तोर

चंडी माता मंदिर प्रांगण में झरना- फोटो : LALITPUR

खंडहर पड़ी आल्हा ऊदल कचहरी- फोटो : LALITPUR

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