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आस्था के केंद्र हैं आचार्य विद्यासागर महाराज

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ललितपुर। त्याग और परोपकार के जीवंत रूप संत शिरोमणि दिगंबर जैनाचार्य विद्यासागर महाराज का व्यक्तित्व और कृतित्व अद्वितीय है। आचार्य ने मुनि दीक्षा दिवस के 54 वर्ष पूर्ण कर लिए हैं। जैन समाज के लोगों ने आचार्य के मुनि दीक्षा दिवस के अवसर पर हुई परिचर्चा में अपने विचार रखकर गुरु की महिमा का वर्णन किया है। आचार्यका जन्म 10 अक्तूबर 1946 को शरद पूर्णिमा के दिन कर्नाटक प्रांत के बेलगांव के सदलगा में हुआ था। आचार्य जन्म से ही वैराग्य वृत्ति और विलक्षण प्रतिभा के धनी हैं। बाल ब्रह्मचर्य की साधना करते हुए 22 वर्ष की अवस्था में अजमेर (राजस्थान) में आषाढ़ शुक्ल पंचमी पर 30 जून 1968 को गुरुदेव आचार्य ज्ञानसागर महाराज से दिगंबर दीक्षा ग्रहण की थी।
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अध्यात्म जगत के महासूर्य हैं आचार्य : ममता जैन
ममता जैन का कहना है कि आचार्य न केवल श्रमण संस्कृति के दैदीप्यमान नक्षत्र हैं बल्कि भारतीय संस्कृति को उन्होंने अपनी साधना के बल पर गौरांवित किया है। आचार्य जैन परंपरा के महान संत हैं।
जनजन के संत हैं आचार्य : शीलचंद्र जैन
शीलचंद्र जैन शास्त्री का मानना है कि आचार्य जन-जन की आस्था के केंद्र हैं। इनकी प्रेरणा से हजारों गोवंश की रक्षार्थ देशभर में सैकड़ों गोशालाएं संचालित हो रही हैं। आचार्य जनकल्याण के लिए ही चिंतन करते हैं।
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आचार्य की तपस्या वज्र से कठोर : पुष्पेंद्र जैन
शिक्षक पुष्पेंद्र जैन का कहना है कि आचार्य विद्यासागर जी का बाह्य व्यक्तित्व भी उतना ही मनोरम है, जितना अंतरंग, तपस्या में वे वज्र से कठोर हैं, पर उनके मुक्त हास्य और सौम्य मुख मुद्रा से कुसुम की कोमलता झलकती है।
राष्ट्रीय चेतना के संवाहक हैं आचार्य : प्रवीण जैन
प्रवीण जैन का कहना है कि आचार्य की हस्तलिखित कृति हिंदी भाषा में रचित अद्वितीय महाकाव्य मूकमाटी और संस्कृत में सृजित षट् शतक पर देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों में शोधार्थियों ने शोध करके पीएचडी की उपाधि ग्रहण की है।
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