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समृद्धि और सौभाग्य के प्रतीक नीलकंठ के दर्शन हुए दुर्लभ

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नीलकंठ का जोड़ा (फाइल फोटो)
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विजया दशमी पर नीलकंठ के दर्शन होते हैं शुभ, शिव स्वरूप में है इनकी मान्यता

बांकेगंज। दुधवा नेशनल पार्क में निरंतर कम हो रहे पक्षियों में नीलकंठ भी शामिल है। पहले यह अक्सर दिख जाया करता था, लेकिन अब तो यह कभी-कभार ही देखने को मिलता है। विजया दशमी पर इसके बेहद शुभ माना जाने वाले दर्शन इस बार लोग नहीं कर सके।
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नीलकंठ को कष्टनाश कहते हैं। जिसका अर्थ कष्टों को नाश करने वाला होता है। कष्टनाश अपभ्रंस होते-होते अब कटनाश हो गया। दुधवा में पक्षियों की संख्या में आ रही कमी का असर नीलकंठ पर भी पड़ा है। अब यह पक्षी यदा-कदा ही दिखाई देता है। आज से 20-25 साल पहले यह पक्षी आमतौर से पेड़ों पर और छत की मुंडेर पर भी दिख जाते थे, लेकिन अब यह बेहद मुश्किल से दिखते हैं। इनकी संख्या में दशकों पहले ही कमी आना शुरू हो गई थी और अब इनकी संख्या काफी कम हो गई है। पहले विजया दशमी के दिन बहेलिया जाति के लोग नीलकंठ को लेकर घर-घर दिखाया करते थे, लेकिन अब पक्षियों का शिकार प्रतिबंधित होने के कारण उन्हें भी यह पक्षी नहीं मिल पाते।
गोला के मशहूर पंडित शास्त्री रामदेव मिश्र बताते हैं कि नीलकंठ को भगवान शिव का स्वरूप माना जाता है। विजया दशमी के दिन इनका दिखाई पड़ना सुख, समृद्धि और सौभाग्य का प्रतीक है। पौराणिक आख्यानों के अनुसार, भगवान राम जब रावण का वध करने के लिए अपने शिविर से प्रस्थान किया तो उन्हें नीलकंठ के दर्शन हुए, जिसके परिणाम स्वरूप उन्हें रावण पर विजय प्राप्त हुई। रावण पर राम की विजय के रूप में दशहरा मनाया जाता है। इसलिए विजया दशमी पर नीलकंठ पक्षी के दर्शन करना बेहद शुभ माना जाता है। (संवाद)

विलुप्त होने की कगार पर नीलकंठ

दुधवा टाइगर रिजर्व बफरजोन के उपनिदेशक डॉ. अनिल कुमार पटेल ने बताया कि नीलकंठ अन्य पक्षियों की तरह विलुप्त होने की कगार पर है। अन्य पक्षियों की तरह इनकी संख्या में भी कमी आई है। इसका बॉयलोजिकल नाम (कोरेशियस बेन्गालेन्सिस) है। इसके संरक्षण के लिए लोगों को जागरूक होने की जरूरत है।
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