लखीमपुर खीरी। शहर के बीच स्थित मां संकटा देवी का प्राचीन मंदिर न केवल लखीमपुर खीरी बल्कि आसपास के जिलों के लोगों की भी आस्था का केंद्र है। मान्यता है कि भगवान श्रीकृष्ण ने यहां मां लक्ष्मी की दिव्य प्रतिमा स्थापित की थी। सभी का संकट हरने वाली मां संकटा देवी महालक्ष्मी का ही स्वरूप हैं। मां लक्ष्मी के नाम पर इस शहर का नाम लक्ष्मीपुर पड़ा, जो अपभ्रंश होकर अब लखीमपुर है। जहां मां संकटा देवी का मंदिर है उस मोहल्ले का नाम संकटा देवी है।
किंवदंती है कि महाभारत युद्ध के बाद भगवान श्रीकृष्ण अपनी पत्नी रुक्मिणी के साथ भगवान पशुपति नाथ के दर्शन करने के लिए इसी रास्ते से होकर निकले थे। तब यहां सघन वन हुआ करता था। जो नैमिषारण्य क्षेत्र के अंतर्गत आता था। इस वन क्षेत्र की रमणीयता रुक्मिणी को इतनी भायी कि उन्होंने यहां वास करने की इच्छा जाहिर की। देवी रुक्मिणी के आग्रह पर श्रीकृष्ण ने भगवान पशुपति नाथ के दर्शन कर लौटते समय यहां मां लक्ष्मी की प्रतिमा स्थापित की और विधिवत पूजा अर्चना की थी।
बाद में आबादी बढ़ना शुरू हुई तो जंगल काटकर बस्तियां बसने लगीं। जंगल में खोदाई के दौरान देवी मां की मूर्ति मिलने पर महेवा स्टेट के तत्कालीन राजा ने मठिया और उनके उत्तराधिकारियों ने भव्य मंदिर का निर्माण कराया। मंदिर की देखरेख महेवा स्टेट के राज परिवार की ओर से की जाती है।
महेवा स्टेट के कुंवर राघवेंद्र बहादुर सिंह ने बताया कि सोलहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्घ में उनके पूर्वज राजा बलभद्र सिंह ने मूर्ति मिलने पर मठिया का निर्माण कराया था। इसके बाद सन 1922 में तत्कालीन राजा जयेंद्र बहादुर सिंह ने भव्य मंदिर का निर्माण कराया।
भूरे रंग के पत्थर से बनी है मां संकटा देवी की मूर्ति
मां संकटा देवी की प्राचीन मूर्ति भूरे रंग के पत्थर से बनी है। इस पर चांदी का कवच पहनाकर मूर्ति को सुंदर आकृति प्रदान की गई है। मंदिर के गर्भगृह में सिंहासन पर मूर्ति विराजमान है। मंदिर का मुख्य द्वार पूरब की ओर है। दक्षिण दिशा में एक विशाल द्वार और उत्तर दिशा में छोटा द्वार सुविधा के लिए बनाया गया है। मुख्य मंदिर के सामने विशाल बरामदा है, जिसमें अब अखंड ज्योति प्रज्जवलित है।
विशाल मंदिर प्रांगण के चारों ओर छायादार प्रदक्षिणा पथ है। इसके परिसर में शिव और हनुमान का मंदिर भी है। कभी यहां पशु बलि देने की भी प्रथा थी। मंदिर आज भी महेवा स्टेट के स्वामित्व में है, लेकिन मंदिर की व्यवस्था मां संकटा देवी आरती समिति और दूसरी संस्थाएं करती हैं।
मां महालक्ष्मी के रूप में होती है मां संकटा देवी की पूजा
मां संकटा देवी की पूजा मां महालक्ष्मी के रूप में होती है, जबकि लखीमपुर शहर में ही प्रतिष्ठित मां शीतला देवी महागौरी और मां संकटा देवी महा सरस्वती के रूप में पूजित हैं। यह तीनों मंदिर महाभारत कालीन बताए जाते हैं। यह तीनों देवियां राजा वेन की सात कन्याओं में से हैं। लोगों की प्राचीन संकटा देवी में गहन आस्था है। मान्यता है कि मां संकटादेवी की उपासना करने से सभी संकट दूर होते हैं और जीवन में सुख समृद्धि की प्राप्ति होती है। शहर के लोग कोई शुभ काम करने से पहले मां संकटा का आशीर्वाद लेना नहीं भूलते। शारदीय और वासंतिक नवरात्र पर यहां भक्तों की काफी भीड़ उमड़ती है। इसके अलावा अषाढ़ माह में यहां अषाढ़ी मेला लगता है।