लखीमपुर खीरी। हिंदी जन जन की भाषा बने और विश्वस्तर पर इसकी स्वीकार्यता हो इसके लिए इच्छा शक्ति का होना बहुत जरूरी है। जरूरी है कि सरकारी स्तर से इसके लिए प्रयास हों, साथ ही आम लोग भी ज्यादा से ज्यादा हिंदी बोलने, लिखने और पढ़ने में रुचि लेें। हिंदी बोलने में हम गौरव का अनुभव करें। हिंदी पूर्ण विकसित भाषा है। इसका शब्द कोष समृद्ध है। हिंदी जितनी दुनिया में कोई वैज्ञानिक भाषा नहीं है। आधुनिक तकनीक से दुनिया भर में हिंदी का प्रसार किया जा सकता है। भारतीय सभ्यता और संस्कृति तो हिंदी में ही निहित है। हम अपनी गौरवशाली संस्कृति पर गर्व करने के साथ इस बात पर भी गर्व करें कि हिंदी हैं हम। हिंदी अपनी परिपक्वता और वैज्ञानिकता के कारण देश में ही नहीं दुनिया में भी अपना अलग स्थान बना सकती है।
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हिंदी हमारी सभ्यता और संस्कृति की द्योतक है। इसकी वैज्ञानिक परिपक्वता ने इसे विशिष्ट बनाया है। सर्वत्र सहजता और सुगमता से हिंदी प्रयोग की जा रही है। देवनागरी लिपि का कोई जवाब ही नहीं है। यह लिपि जितनी मधुर है उतनी ही वैज्ञानिक भी। न्यायालय, बैंकिंग और कतिपय अन्य क्षेत्रों में अभी अंग्रेजी का ही प्रयोग हो रहा है। अच्छा होगा यदि इन स्थानों पर हिंदी अधिक से अधिक प्रयोग में लाई जाए।
-स्वाति शुक्ला, एसडीएम मोहम्मदी
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हिंदी विश्व की सर्वाधिक वैज्ञानिक भाषा है। इसका अक्षर अक्षर परिभाषा है। देव भाषा संस्कृत का स्थान हिंदी के पास सुरक्षित है। विश्व में संपर्क भाषा के रूप में चलायमान अंग्रेजी की वर्णमाला से दोगुनी पूंजी से हिंदी समृद्ध है। शब्दों की फिटिंग, शिल्प योजना, रस, छंद, अलंकार, ध्वनि व्यंजना बेजोड़ है। संस्कृति से अनुबंधित, संस्कारों से पूजित, जनमानस के हृदय में स्थित हिंदी का भविष्य तेजोमय है।
-श्रीकान्त सिंह, व्यंग्यकार, जंगबहादुरगंज
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हिंदी भाषा के उन्नयन के लिए सरकारी अंग्रेजी माध्यम स्कूलों को बंद कर मातृभाषा के माध्यम से शिक्षा प्रदान करने का सरकार का निर्णय सराहनीय है। इससे हमारी मातृभाषा और अधिक समृद्ध होगी। इंटरनेट पर उपलब्ध गैजेट हिंदी भाषा के प्रयोग को रोचक और सुगम बनाते हैं। हिंदी भाषी क्षेत्र की सभी शैक्षणिक संस्थाओं में मातृभाषा के माध्यम से शिक्षण अनिवार्य किया जाए। जिससे छात्र शुद्ध हिंदी लिखना, बोलना व पढ़ना सीख सकें।
-अरविन्द कुमार, कवि, मैगलगंज -
हिंदी भाषा से हम अपने जीवन की शुरुआत करते हैं इसीलिए हिंदी को मातृभाषा कहते हैं। लोगों की रुचि हिन्दी भाषा के प्रति कम होती जा रही है। किसी भाषा का आलोचना करना हमारा तात्पर्य नहीं है। हमें सभी भाषाओं की जानकारी रखना जरूरी है लेकिन अपनी भाषा की कद्र करना भी सर्वोपरि है। जिसकी वजह से संपूर्ण विश्व में एक अस्मिता बनी हुई है इसीलिए हमें अपनी मातृ भाषा हिन्दी के प्रति प्रेम होना चाहिए।
-परमजीत कुमार गौतम, प्रवक्ता हिंदी, श्री गुरु तेग बहादुर सीनियर सेकेंडरी स्कूल महंगापुर