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भावनात्मक रिश्ते बनाती है हिंदी, गर्व करें कि हम हिंदी भाषी हैं

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लखीमपुर खीरी। हिंदी समाज में भावनात्मक रिश्ते बनाती है। हमें गर्व होना चाहिए कि हम हिंदीभाषी हैं। मातृभाषा हिंदी होने के बावजूद आज के समय में लोग इसे बोलने में अपने को हीन समझते हैं। यही कारण है कि हिंदी को जो स्थान मिलना चाहिए था वह आज तक नहीं मिल सका। हिंदी प्रेमियों का कहना है कि आधुनिकता की अंधी दौड़ और पाश्चात्य सभ्यता के अंधानुकरण के चलते अपने ही देश में हिंदी उपेक्षा का शिकार हो रही है। विदेशी भाषा इस पर हावी होती जा रही है। ऐेसे में आवश्यकता है हिंदी को बढ़ावा देने की, अभियान चलाकर सरकारी से लेकर निजी कार्यालयों में इसे अनिवार्य करने की। बोलचाल में हिंदी का अधिक से अधिक इस्तेमाल हो तभी हिंदी अपना गौरव हासिल कर सकेगी।
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हिंदी को बढ़ावा देने के लिए समाज के हर वर्ग को आगे आने होगा। इसके लिए सभी कार्यालयों में हिंदी में काम अनिवार्य किया जाए। जिस तरह चुनाव होने पर मतदान के लिए अभियान चलाया जाता है ठीक उसी प्रकार हिंदी को बढ़ावा देने के लिए अभियान चलना चाहिए। कुछ जगहों पर आज भी अंग्रेजी में फार्म होते हैं, जिन्हें भरने में भी लोगों को कठिनाई होती है। इसलिए सभी कार्यालयों में हिंदी में फार्म अनिवार्य होने चाहिए। जरूरी है कि हिंदी बोलने वालों को सम्मानित किया जाए, जिससे उन्हें मातृभाषा बोलने में झिझक न हो।
- विनोद कुमार, प्रधानाचार्य राजकीय इंटर कॉलेज धौरहरा
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हिंदी के प्रचार प्रसार के लिए विश्व हिंदी सम्मेलन भी आयोजित होते हैं। वहीं किसी न किसी रूप में विश्व के कई देशों में हिंदी भाषा का प्रयोग होता है। कुछ देशों में जहां आधिकारिक भाषा के रूप में तो कुछ में सामान्य बोलचाल की भाषा के रूप में हिंदी उपयोग में लाई जाती है। हिंदी के प्रयोग पर प्रशासनिक बल नहीं दिया जा रहा। वास्तव में हिंदी के उत्थान के लिए मुख्य रूप से प्रशासनिक स्तर से जागरूकता अभियान चलाए जाने की जरूरत है।
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-ओमप्रकाश ‘सुमन, साहित्यकार, पलियाकलां
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हिंदी भारत की आत्मा में वास करती है। समय के बदलते परिवेश में संगणकीय पद्धति, मोबाइल, अत्याधुनिक तकनीक से पठन, पाठन, ऑनलाइन शिक्षण और तकनीकी के बढ़ते प्रभाव ने हिंदी को प्रभावित तो किया है लेकिन रुचि में कमी नहीं आई है। हिंदी को बढ़ावा देने के लिए हमारे देश को भारतीय संस्कृति की ओर लौटना होगा। अपसंस्कृति के बढ़ते दुष्प्रभाव से स्वयं को और देश को बचाए रखने की जरूरत है। हिंदी को बढ़ावा देने के लिए अहिंदी भाषी प्रांतों समेत देश के सभी बोर्डों में हिंदी अनिवार्य करनी चाहिए।
-डॉ. अनिल कुमार त्रिपाठी, हिंदी शिक्षक राजकीय इंटर कॉलेज
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हिंदी विश्व की सबसे वैज्ञानिक भाषा है। अनेक भाषाओं का जन्म हिंदी से हुआ लेकिन यह अपने ही देश में बेगानी होती जा रही है जिसके लिए हम खुद जिम्मेदार हैं। आम बोलचाल की भाषा में लोग जानबूझ कर अंग्रेजी और उर्दू शब्दों का इस्तेमाल करते हैं। अंग्रेजी बोलने में वह आधुनिकता का बोध करते हैं हिंदी बोलने में उन्हें पिछड़ेपन का आभास होता है यही प्रवृत्ति हिंदी को पीछे ढकेल रही है। जरूरत है इस बात की है कि हम हिंदी बोलने में गर्व का अनुभव करें और दूसरों को भी ऐसा करने के लिए प्रेरित करें। समाज में हिंदी का पूरा माहौल तैयार करें तभी हिंदी अपना गौरवपूर्ण स्थान प्राप्त कर सकेगी।
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-डॉ. सौरभ दीक्षित, शिक्षक गांधी विद्यालय गोला
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