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यादों के झरोखे से : 1920 में नसीरुद्दीन मौजी को सीतापुर जेल में दी गई थी फांसी

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नसीरुद्दीन मौजी के नाम पर है अब हॉल, पहले था विलोबी हॉल
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लखीमपुर खीरी। आज हम भले ही स्वाधीन होकर चैन से अपनी जिंदगी बसर कर रहे हों, लेकिन सौ साल पहले तक यह आसान न था। जनपद के तमाम स्वतंत्रता संग्राम सेनानी आजाद भारत के सपने देखते हुए अंग्रेजों से लोहा ले रहे थे, जिसमें नसीरुद्दीन मौजी का नाम प्रमुख है। नसीरुद्दीन मौजी ने 26 अगस्त 1920 को अंग्रेज कलेक्टर विलोबी का सर कलम कर दिया था। आज कचहरी रोड पर शहीद नसीरुद्दीन मौजी के नाम पर भवन है, जो कभी अंग्रेज कलेक्टर विलोबी के नाम पर था।
100 साल पहले जब जनपद में स्वाधीनता आंदोलन के दौरान कांग्रेस की स्थापना के बाद एक तरफ अहिंसात्मक आंदोलन चल रहा था तो दूसरी तरफ सशस्त्र क्रांति के पक्षधर अपने ढंग से आजादी की जंग लड़ रहे थे। इसी बीच 26 अगस्त 1920 को बकरीद के दिन खिलाफत आंदोलन से प्रेरित होकर क्रांतिकारी नसीरुद्दीन मौजी ने अपने दो साथियों के साथ मिलकर तत्कालीन अंग्रेज कलेक्टर विलोबी को उसी के घर में तलवार से हमलाकर मौत के घाट उतार दिया था। क्रांतिकारियों ने बकरीद के दो सप्ताह पहले जिलाधीश और कप्तान आदि अफसरों का वध करने की योजना बनाई थी।
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26 अगस्त को नसीरुद्दीन मौजी अपने दो साथियों बसीरुद्दीन और माशूक अली के साथ अंग्रेज कलेक्टर विलोबी के आवास पर पहुंचे थे, जब विलोबी अपने कैंप कार्यालय में बैठा था। इसी दौरान क्रांतिकारियों ने ललकारने के बाद तलवार के दो वार करके विलोबी का काम तमाम कर दिया। विलोबी की हत्या करने के बाद नसीरुद्दीन मौजी अपने साथियों के साथ शहर के कसाई टोला में जा छिपे थे। इस बीच पुलिस ने उनकी तलाश में शहर का चप्पा चप्पा छान डाला, लेकिन दुर्भाग्य वश मुखबिर की सूचना पर उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया।
नसीरुद्दीन मौजी और उनके तीनों साथियों पर मुकदमा चला। नसीरुद्दीन मौजी से सफाई में गवाहों की सूची मांगी गई तो उन्होंने महात्मा गांधी, मौलाना अबुल कलाम आजाद और मौलाना शौकत अली का नाम दिया। अदालत ने इन गवाहों को तलब करने की इजाजत नहीं दी। मुकदमे की औपचारिकता पूरी करने के बाद इन तीनों को फांसी की सजा दी गई। इंकलाब जिंदाबाद के नारे लगाते हुए तीनों क्रांतिकारी फांसी के फंदे पर झूल गए।
कलेक्टर आवास पर चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी थे नसीरुद्दीन उर्फ मौजी
मोहल्ला थरवरनगंज निवासी नसीरुद्दीन उर्फ मौजी कलेक्टर आवास पर चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी के रूप में कार्यरत थे। इस कारण उनका कलेेक्टर आवास में बेरोकटोक आना जाना था। इससे उन्हें विलोबी की हत्या करने में आसानी हुई। उन्हें सीतापुर जेल में फांसी दी गई थी। आज भी जिले में उनके नाम से कोई प्रत्यक्ष रूप से कोई स्मारक नहीं है। नसीरुद्दीन के वंशज आज भी थरवरनगंज मोहल्ले में रहते हैं।
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आजादी के 50 साल बाद मिला सम्मान
नसीरुद्दीन की शहादत के बाद अंग्रेज परस्त लोगों ने नसीरुद्दीन मौजी के नाम से कोई स्मारक बनवाने की बजाय अंग्रेज कलेक्टर विलोबी की याद में विलोबी मेमोरियल हाल का निर्माण कराया। स्वतंत्रता दिवस की स्वर्ण जयंती के मौके पर जिला प्रशासन ने विलोबी मेमोरियल हाल का नाम बदलकर नसीरुद्दीन मौजी भवन कर दिया। मौजूदा समय में यही भवन शहीद नसीरुद्दीन मौजी का स्मारक है। इसमें एक लाइब्रेरी भी संचालित है।
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