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फादर्स डे : वृद्धाश्रम में बेटों की राह तकते रहे पिता

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बोले बुजुर्ग, हम क्या जाने फादर्स डे, हम तो बेटों की उपेक्षा के कारण काट रहे वृद्घाश्रम में दिन
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लखीमपुर खीरी। रविवार को सोशल मीडिया पर एक तरफ युवा फादर्स डे के दिन पिता के साथ अपनी फोटो शेयर कर रहे थे तो वहीं वृद्घाश्रम में बुजुर्ग बेटों की राह तक रहे थे। उनका कहना था कि मेरे बच्चों से पूछिए, उन्होंने अपने पिता को क्यों छोड़ दिया। मैं ही केवल अकेला नहीं हूं, मेरे जैसे यहां 70 बुजुर्ग हैं, जो अपने बच्चों के होते हुए आज वृद्धाश्रम में रह रहे हैं।
सलेमपुर कोन स्थित वृद्घाश्रम में करीब 70 बुजुर्ग पुरुष और महिलाएं रह रही हैं। इनमें ऐसा कोई नहीं जिसका भरा पूरा परिवार न हो। मगर दुर्भाग्य यह है कि उनके लिए घर में रोटी नहीं है। वृद्घाश्रम में रह रहे हर बुजुर्ग का दर्द लगभग एक जैैसा है। किसी के लिए घर में दो वक्त की रोटी नहीं थी तो कोई शराबी बेटों के कारण रोज-रोज घर में होने वाली कलह और मारपीट से आजिज था। इस कारण घर छोड़कर वृद्घाश्रम में शरण लेकर जीवन बिता रहे हैं।
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वृद्घाश्रम में पिछले एक माह से रह रहे मोहल्ला संकटा देवी निवासी रामसेवक बताते हैं कि दो बेटे हैं। दोनों अलग अलग रहते हैं। मगर हमारे लिए दो रोटी किसी के पास नहीं थी। उम्मीद थी कि बुढ़ापे में बेटे सहारा बनेंगे। मगर आज उनके कारण यह दिन देेखना पड़ा।
तीन साल से वृद्घाश्रम में रह रहे देवकली के पयागपुरवा निवासी राजबहादुर बताते हैं कि अपना घरौंदा कोई भी आसानी से नहीं छोड़ता। दो बेटे और चार बीघा जमीन होने के बाद भी अपने लिए अलग रोटी बनाते थे। बावजूद इसके आए दिन होने वाली हाय हाय से तंग आकर घर छोड़ा।
25 बीघा जमीन के जोतकर सीतापुर के अमनउल्लापुर निवासी रिषीनाथ फादर्स डे पर अपना दर्द छिपा नहीं सके। उन्होंने बताया कि दोनों बेटों को जमीन दे दी, फिर भी रोटी की जगह रोज गालियां मिलती थीं। हमारी दशा देखकर बेटी ने उन्हें यहां रखवा दिया।
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तीन साल से वृद्घाश्रम में रह रहे नौरंगाबाद निवासी रघुवीर बताते हैं कि दो बेटे, बहुएं और पोते पोतियां हैं। सोचा था कि बेटे बुढ़ापे का सहारा बनेंगे और पोते पोतियों के साथ हंसते खेलते बुढ़ापा कटेगा। मगर, क्या पता था कि यह दिन देखना पड़ेगा।
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