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धौरहरा, श्रीनगर को छोड़ किसी सामान्य सीट पर पैर नहीं जमा पाए दलित

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लखीमपुर खीरी। जिले के चुनावी इतिहास में अनारक्षित सीटों पर दलित नेता पैर नहीं जमा सके हैं। इसमें केवल धौरहरा और श्रीनगर विधानसभा क्षेत्र अपवाद रहे हैं। यह भी एक रोचक तथ्य है कि अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित सीटों पर हमेशा सवर्ण वोट ही निर्णायक रहे हैं, जबकि सामान्य सीटों पर दलित मतदाता चुनाव परिणामों को प्रभावित करने में कामयाब हुए हैं।
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वर्ष 1952 में हुए विधानसभा चुनाव में खीरी जिले में सिर्फ चार विधानसभा क्षेत्रों से छह विधायक चुने गए थे। इनमें पहले विधानसभा क्षेत्र निघासन कम लखीमपुर नार्थ में दो सीटें थीं एक सामान्य और दूसरी सुरक्षित सीट। इस चुनाव में सामान्य सीट से कांग्रेस के करन सिंह और सुरक्षित सीट से कांग्रेस के ही बाबू जगन्नाथ प्रसाद चुनाव जीते थे। दूसरी सीट लखीमपुर साउथ में भी यही स्थिति थी। इसमें सामान्य सीट से कांग्रेस के बंशीधर मिश्र और सुरक्षित सीट से कांग्रेस के छेदा लाल चौधरी चुनाव जीते।
1957 के चुनाव चार की जगह पांच विधानसभा क्षेत्र धौरहरा, निघासन, श्रीनगर, खीरी और मोहममदी बने। इनमें मोहम्मदी विधानसभा क्षेत्र को अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित घोषित किया। तब से लेकर 2007 के चुनाव तक यह सीट सुरक्षित रही। वर्ष 2008 में हुए नए परिसीमन में यह सीट सामान्य हो गई। इसके बाद वर्ष 2012 और 2017 में दो बार विधानसभा सभा चुनाव हुए, जिसमें दलित वर्ग का एक बार भी विधायक नहीं बन सका। 2012 में बसपा से बाला प्रसाद अवस्थी और 2017 में भाजपा के लोकेंद्र प्रताप सिंह विधायक बने।
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हैदराबाद विधानसभा क्षेत्र वर्ष 1962 में अस्तित्व में आया। यह सीट हमेशा सामान्य रही। इस सीट से कभी दलित वर्ग का कोई विधायक नहीं चुना जा सका। हैदराबाद ही वर्ष 2008 में गोला क्षेत्र बना और सीट सामान्य ही रही। हैदराबाद से गोला बनने के बाद भी यहां दलित अपने पैर नहीं जमा सके। पैला विधानसभा क्षेत्र भी 1962 में अस्तित्व में आया। यह क्षेत्र हमेशा सुरक्षित रहा, लेकिन यहां सवर्ण वोटों ने सभी चुनावों में अपनी निर्णायक भूमिका निभाई।
लखीमपुर विधानसभा सीट हमेशा सामान्य सीट रही। यहां से कभी कोई दलित विधायक नहीं चुना जा सका।
इसी तरह विधानसभा क्षेत्र निघासन हमेशा ही सामान्य सीट रही है। यहां 1952 से लेकर आज तक एक भी दलित विधायक नहीं चुना जा सका है, जबकि दलित वोट यहां हमेशा निर्णायक भूमिका में रहे हैं। पलिया विधानसभा क्षेत्र का सृजन 2008 के परिसीमन में हुआ। इसके बाद यहां हुए दो चुनावों में कोई दलित विधायक नहीं बन सका।
सामान्य सीट होते हुए भी धौरहरा में चार बार बने दलित विधायक
वर्ष 1957 में स्वतंत्र रूप से अस्तित्व में आया धौरहरा विधानसभा क्षेत्र शुरुआत से ही अनारक्षित रहा है, लेकिन यहां दलितों का दबदबा देखने को मिला। कांग्रेस के कद्दावर दलित नेता बाबू जगन्नाथ प्रसाद धौरहरा क्षेत्र से एक बार कांग्रेस, एक बार प्रजा सोशलिस्ट पार्टी से और दो बार निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव जीत कर विधायक बने हैं। यहां भी दलित मतदाता हमेशा से निर्णायक की भूमिका में रहे हैं। 1980 के बाद यहां से कोई दलित विधायक नहीं बन सका।
श्रीनगर में लगातार दो बार रहे दलित विधायक
श्रीनगर विधानसभा क्षेत्र शुरुआत से लेकर 2007 के चुनाव तक सामान्य सीट रही है इस सीट पर वर्ष 1993 तक ब्राह्मण और क्षत्रियों का दबदबा रहा। इस बीच दो बार कमाल अहमद रिजवी भी विधायक रहे। 1996 में पहली बार दलित वर्ग की माया प्रसाद बसपा के टिकट पर चुनाव जीत कर विधायक बनीं। इसके 2002 में भी वह चुनाव जीतने में कामयाब रहीं 2007 में सपा के आरए उस्मानी विधायक बने। 2012 के चुनाव से यह सीट अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित हो गई। इस सीट पर हमेशा दलित और मुस्लिम वोट निर्णायक की स्थिति में रहे हैं।
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