लखीमपुर खीरी। बरसात का मौसम ग्रामीण इलाकों के लिए कई मुसीबतें साथ लेकर आता है। इन दिनों तालाबों में मगरमच्छ लोगों के लिए मुसीबत बन गए हैं। मगरमच्छ के हमले की सबसे ज्यादा घटनाएं निघासन क्षेत्र में हो रही हैं। वन विभाग के अधिकारी लोगों को बारिश के दिनों में नदी, नालों और तालाबों के किनारे न जाने की सलाह दे रहे हैं। यहां बता दें कि पिछले साल जिले में करीब 25 मगरमच्छों को रेस्क्यू किया गया था।
पानी का शेर कहे जाने वाले मगरमच्छ आमतौर पर नदियों में पाए जाते हैं लेकिन बरसात के मौसम में नदियों के उफनाने पर मगरमच्छ बड़ी नदियों से निकलकर छोटी नदियों, नालों और तालाबों में आ जाते हैं। मगरमच्छ का मुख्य भोजन मछलियां और दूसरे जलीय जीव होते हैं, लेकिन सामने पड़ने पर यह इंसानों और जानवरों को नहीं छोड़ते। पिछले एक साल के अंदर ही करीब 10 लोग मगरमच्छों का निवाला बन चुके हैं।
हाल ही में निघासन क्षेत्र के बैलहा गांव में एक चौकीदार ईश्वरदीन को मगरमच्छ खींच ले गया था, उसके चीखने चिल्लाने पर गांव वालों ने उसे बचा तो लिया, लेकिन वह बुरी तरह घायल हो चुका था। हादसे के 11वें दिन इलाज के दौरान ही उसकी मौत हो गई थी। इससे कुछ दिन पहले बहतिया नाले से निकले एक मगरमच्छ ने मवेशी चरा रहे एक बालक को अपना निवाला बना लिया था।
जिले की नदियों में बड़ी संख्या में मगरमच्छ हैं। आमतौर पर बरसात के मौसम में जब नदियों में बाढ़ आती है तो नदियों से निकलकर मगरमच्छ तालाबों में आ जाते हैं। इस दौरान कभी-कभी तालाबों या नदी-नालों के पास जाने वाले लोगों पर मगरमच्छ हमला भी कर देते हैं। सावधानी ही बचाव है। मगरमच्छों के आबादी के पास आने पर वन विभाग उन्हें रेस्क्यू कर सुरक्षित नदियों में छोड़ता है।
- डॉ. अनिल कुमार पटेल, उपनिदेशक दुधवा टाइगर रिजर्व बफर जोन