लखीमपुर खीरी। आम तौर पर कौवे की कर्कस कांव-कांव आवाज किसी को नहीं भाती। रूप रंग और स्वभाव से भी कौआ किसी को प्रिय नहीं लगता। इसके बावजूद पितृपक्ष में कौओं का महत्व अचानक बढ़ जाता है। कौओं को निवाला खिलाने के लिए उनकी तलाश शुरू हो जाती है। बिगड़ रहे पर्यावरण के चलते कौओं की संख्या में लगातार कमी होती जा रही है। अब लोग इस बात से परेशान हैं कि कौवे नहीं मिले तो पितरों को भाग कौन पहुंचाएगा।
पितृ पक्ष में गाय, कुत्ता और कौओं को पितरों के हिस्से का निवाला खिलाने की परंपरा आदि काल से चली आ रही है। कौओं को पितरों का प्रतिनिधि और उन्हें अर्पित किए जाने वाले भोजन का संवाहक माना जाता है। भले ही यह परंपरा आज के संदर्भ में अंधविश्वास की श्रेणी में आती हो लेकिन यह प्राचीन परंपरा वास्तव में पशु पक्षियों का पोषण करने के भाव को लेकर प्रचलित हुई जिसका निर्वहन आज तक हो रहा है।
कौआ प्रकृति में गिद्ध के बाद दूसरी श्रेणी का सफाई कर्मी माना जाता है। वह न केवल हानिकारक कीड़ों मकोड़ों और चूहों को खाता है बल्कि मृत पशुओं के अवशिष्ट को भी खा जाता है। पिछले तीन दशक में इनकी संख्या में 60 से 70 फीसदी तक कमी आई है। इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजरवेशन ऑफ नेचर की रिपोर्ट के मुताबिक विश्व के 12 फीसदी पक्षी लुप्त होने की कगार पर हैं। इनमें कौआ प्रमुख है। आवासीय क्षेत्रों में घटते पेड़ों की संख्या से इनके आवास का संकट पैदा हुआ है। फसल चक्र में बदलाव भी इनकी कमी का कारण है।
कौओं की घटती संख्या का है यह कारण
- आवासीय क्षेत्रों में पेड़ों की संख्या में कमी होना।
-खेतों में अंधाधुंध कीटनाशक और खरपतवार नाशक दवाओं का इस्तेमाल।
-मोबाइल टावरों से होने वाला रेडिएशन।
-घरों से मिलने वाले भोजन में कमी।
-चूहे मारने के लिए जहर का प्रयोग, जिसे खाकर कौवे मर रहे हैं।
जिले में मिलते हैं दो प्रजाति के कौवे
पर्यावरणविद् केके मिश्र का कहना है कि जिले में कौओं की दो प्रजातियां पाई जाती हैं। आबादी क्षेत्र में पाई जाने वाली हाउस क्रो और जंगलों में पाई जाने वाली प्रजाति वाइल्ड क्रो। जंगल में मिलने वाला वाइल्ड क्रो पूरी तरह गहरे काले रंग का होता है जबकि हाउस क्रो की गर्दन ग्रे कलर की होती है बाकी हिस्सा काले रंग का होता है। हाउस क्रो वाइल्ड क्रो से अपेक्षाकृत छोटे आकार का होता है। कौआ वास्तव में काफी चतुर और धूर्त प्राणी माना जाता है इसीलिए चतुराई और धूर्तता की बात करते समय उसकी उपमा कौवे से की जाती है।
प्रकृति में मिलने वाले हर प्राणी का अपना अलग महत्व है। कौओं को गिद्घों की तरह प्रकृति का सफाईकर्मी माना जाता है। प्राकृतिक आवास, भोजन के संकट, टावरों के रेडिएशन और पेस्टीसाइट्स और इंसेक्टीसाइट्स के अधिक इस्तेमाल से कौओं की संख्या में लगातार कमी आ रही है।
- डॉ. अनिल कुमार पटेल, उपनिदेशक दुधवा टाइगर रिजर्व बफर जोन