आपसी सहयोग से बनवाए गए थे हजारों घोंसले
मुख्यमंत्री की पहल पर मार्च, अप्रैल में गौरैया संरक्षण के लिए वन विभाग की ओर से इस बार एक अभिनव प्रयोग किया गया था। यह प्रयोग पूरी तरह फ्लाप साबित हुआ।
एक अध्ययन में यह पाया गया था कि भवनों की आधुनिक निर्माण शैली और आबादी क्षेत्र में पेड़ों के कमी होने से गौरैयों के घोंसले बनाने के अनुकूल जगह की कमी हो रही है। इससे गौरैया की आबादी में कमी आ रही है। गौरैयों को उपयुक्त घर देने के लिए वन विभाग ने लकड़ी के घोंसले जगह-जगह स्थापित करने की योजना बनाई थी। हजारों की संख्या में घोंसले बनाकर लगाए भी गए लेकिन गौरैया ने इन्हें नहीं अपनाया।
गौरैया संरक्षण अभियान के तहत वन विभाग ने हजारों की संख्या में लकड़ी के कृत्रिम घोंसले बनवाकर घरों और दफ्तरों में लगवाए थे, लेकिन इन घोंसलों को गौरैया ने नहीं अपनाया। हालांकि इस अभियान में वन विभाग और पर्यावरण संरक्षण के लिए काम करने वाली स्वयंसेवी संस्थाओं ने काफी उत्साह दिखाया था। इन घोंसलों के गौरैया के न अपनाने से लोगों का उत्साह और कोशिशों पर पानी फिर गया।
लोगों के सहयोग से दक्षिण खीरी वन प्रभाग और उत्तर खीरी वन प्रभाग ने एक-एक हजार प्लाईवुड के घोंसले बनवाए थे। इसके अलावा जिला प्रशासन की ओर से भी करीब एक हजार घोंसले और स्वयंसेवी संस्थाओं ने अपने स्तर से एक हजार घोंसले बनाकर स्कूली बच्चों, आम नागरिकों को वितरित किए। सरकारी दफ्तरों में भी यह घोंसले लगाए गए। स्कूली बच्चों और नागरिकों ने भी अपने घरों में यह घोंसले लगाए।
लोग इंतजार करते रहे कि गौरैया इन घोंसलों में आएंगी और इसमें अंडे देंगी लेकिन एक भी घोंसला गौरैया से आबाद न हो सका। लोग अब तक इंतजार कर रहे हैं। गौरैया हैं कि इन कृत्रिम घोंसलों को किसी भी तरह अपनाने को तैयार नहीं हैं।
वन विभाग के अधिकारियों का कहना है कि गौरैयों के नेस्ट बाक्स बनाने के लिए शासन से कोई बजट नहीं मिला था। सभी नेस्ट बाक्स आपसी सहयोग से बनाए गए थे। यह बात सही है कि गौरैया ने कृत्रिम घोंसले नहीं अपनाए है। यह बात सर्वे में स्पष्ट हो चुकी है।
इस बाबत राज्य वन्यजीव सलाहकार परिषद के पूर्व सदस्य और पर्यावरणविद् डॉ. वीपी सिंह का कहना है कि गौरैया कृत्रिम घोंसले को कभी नहीं अपनाएंगी। इस बात की पहले ही आशंका थी। यह प्रयोग पूरी तरह विफल हुआ है। इतना जरूर हुआ कि लोगों में गौरैया संरक्षण के प्रति जागरूकता बढ़ी है।