फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

Kushinagar News: भारतीय भाषाओं का अंतर्संबंध सांस्कृतिक एकता का प्रतीक

Sat, 14 Mar 2026 01:55 AM IST
गोरखपुर ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, कुशीनगर
विज्ञापन
बुद्ध पीजी कालेज कुशीनगर में भारतीय भाषाओं के अंतर्संबंध पर संगोष्ठी को संबोधित करते प्रो. सुरे
विज्ञापन
कसया। केंद्रीय हिंदी निदेशालय और बुद्ध पीजी काॅलेज के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का शुक्रवार को समापन हुआ। भारतीय भाषाओं का अंतर्संबंध विषयक संगोष्ठी के विभिन्न सत्रों में विद्वानों ने भारतीय भाषाओं के पारस्परिक संबंध और सांस्कृतिक एकता पर अपने विचार व्यक्त किए। भारतीय भाषाओं के अंतर्संबंध को सांस्कृतिक एकता का प्रतीक बताया। मुख्य वक्ता प्रो. सुरेंद्र दुबे ने कहा कि भारतीयों की भावभूमि और सोच एक है, केवल भाषा अलग-अलग है।
विज्ञापन


संगोष्ठी के दूसरे दिन का प्रथम सत्र शोध पत्र वाचन का रहा, जिसकी अध्यक्षता बीआरडी पीजी कॉलेज के हिंदी विभाग के सहायक आचार्य डॉ. प्रद्योत सिंह ने की। इस सत्र में 17 शोधार्थियों ने अपने शोध पत्र प्रस्तुत किए। दूसरा सत्र उत्तर प्रदेश की बोलियों का अंतर्संबंध विषय पर केंद्रित रहा। मुख्य वक्ता बुंदेलखंड विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग की सह आचार्य प्रो. अचला पांडेय ने कहा कि भाषाओं की एकता के मूल में सांस्कृतिक एकता निहित होती है। भाषाओं के बीच आनुवंशिक संबंध, समरूपता और भाषिक अभिलक्षणों के स्तर पर गहरा संबंध दिखाई देता है। उन्होंने कहा कि हिंदी की कई कहावतें बुंदेलखंडी में केवल उच्चारण के अंतर के साथ मिलती हैं, जिससे भाव की एकता स्पष्ट होती है। उन्होंने भारतीयता और सांस्कृतिक एकता को मजबूत करने के लिए कम से कम दो से तीन भाषाएं सीखने पर जोर दिया।
सिद्धार्थ विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग की सहायक आचार्य डॉ. रेणु त्रिपाठी ने कहा कि भाषा समाज के लिए साझा मंच तैयार करती है। भाषाओं में संरचनात्मक अंतर भले हो, लेकिन सभी भाषाएं मानवीय संवेदना की वाहक होती हैं और समाज में समभाव का निर्माण करती हैं।
विज्ञापन


उदित नारायण स्नातकोत्तर महाविद्यालय पडरौना के हिंदी विभाग के सहायक आचार्य डॉ. विजय प्रताप निषाद ने वैदिक संस्कृत से लेकर ब्रज और अवधी के कवियों की पंक्तियों के उदाहरण देते हुए भाषाओं के अंतर्संबंध को स्पष्ट किया।

अध्यक्षता कर रहे गोरखपुर विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के आचार्य प्रो. विमलेश मिश्र ने कहा कि भाषा की शक्ति आम जनमानस को गढ़ने में निहित होती है। भारत भाषाओं और बोलियों का देश है और भाषा, बोली का संबंध परस्पर जुड़ा हुआ है। इस सत्र का संचालन डॉ. संजय कुमार गुप्ता ने किया।

समापन सत्र में पूर्व प्राचार्य प्रो. अमृतांशु शुक्ल ने अतिथियों का स्वागत किया। मुख्य वक्ता भारतीय शिक्षण मंडल के उपाध्यक्ष प्रो. सुरेंद्र दुबे ने कहा कि भाषा को लेकर सबसे प्राचीन चिंतन भारत में हुआ है और पाणिनि विश्व के प्राचीनतम वैयाकरण माने जाते हैं। उन्होंने कहा कि सभी भारतीयों की भावभूमि और सोच एक है, केवल भाषा अलग-अलग है, इसलिए भारतीय भाषाओं के बीच जैविक जुड़ाव है।

विशिष्ट वक्ता के रूप में सिद्धार्थ विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के आचार्य प्रो. हरीश शर्मा ने लोकगीतों के माध्यम से भारतीय भाषाओं की संवेदनात्मक निकटता को रेखांकित किया। संगोष्ठी के प्रभारी अच्युत कुमार ने केंद्रीय हिंदी निदेशालय की स्थापना और उसके कार्यों की जानकारी दी।

संगोष्ठी का प्रतिवेदन बुद्ध पीजी कालेज के हिंदी विभाग के सहायक आचार्य डॉ. आशुतोष तिवारी ने प्रस्तुत किया। उन्होंने बताया कि दो दिवसीय संगोष्ठी में लगभग 30 वक्ताओं ने अपने विचार रखे और 20 से अधिक शोधार्थियों ने शोध पत्र प्रस्तुत किए। समापन सत्र की अध्यक्षता दिल्ली विश्वविद्यालय के भाषा विज्ञान विभाग के भूतपूर्व अध्यक्ष प्रो. रमेश चंद शर्मा ने की। धन्यवाद ज्ञापन डॉ. रामनवल प्रसाद ने किया और संचालन संगोष्ठी के संयोजक प्रो. गौरव तिवारी ने किया।
विज्ञापन


संगोष्ठी में देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों के प्राध्यापक, शोधार्थी और महाविद्यालय के छात्र-छात्राओं ने सहभागिता की।
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें