कुशीनगर में बांसी नदी की तलहटी में हो रही खेती।
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पडरौना। कुशीनगर में गंडक नदी के अलावा 138 बरसाती नाले हैं। इनकी कुल लंबाई 1042 किलोमीटर है। इसमें से बांसी, झरही, बाड़ी और हिरण्यवती आदि का स्वरूप नदियों के समान है। अनियोजित विकास के चलते अधिकांश बरसाती नाले अब जलविहीन हो चुके हैं। इनकी खाली पड़ी जमीनों पर भूमाफियाओं की कुदृष्टि पड़ी तो सिंचाई और राजस्व विभाग के कर्मचारियों की मिलीभगत से जगह-जगह कब्जा शुरू हो गया।
पडरौना और विशुनपुरा ब्लॉक के 50 से अधिक गांवों के बरसात का पानी झरही नाले से होकर बांसी नदी में गिरता था। महज एक दशक पहले तक इसमें भरपूर पानी रहता था, लेकिन जलस्रोत बंद होने के चलते अब इसमें पानी की जगह केवल कीचड़ ही बचा है। 18.40 किलोमीटर लंबे इस बरसाती नाले की खाली जमीन पर कब्जा करने की होड़ सी मची है। खिरकिया पुल के पास इस नाले के करीब आधे हिस्से पर भव्य शवदाह गृह का निर्माण कराया गया है।
निर्माण कार्य कराने वालों ने यहां पानी के बहाव का भी ख्याल नहीं रखा है।
पुल का एक खंभा स्थायी निर्माण के सामने आ गया है। बरसात में इसके चलते नदी का बहाव पूरी तरह से प्रभावित होगा। झरही जैसी ही स्थिति बाड़ी नाले का भी है। खड्डा, नेबुआ नौरंगिया, विशुनपुरा और पडरौना ब्लॉक से होकर बहने वाले बरसाती नाले की लंबाई 48 किलोमीटर है। इस नाले में पानी सूखते ही लोगों ने कब्जा करना शुरू कर दिया।
जगह-जगह इसकी तलहटी में लोगों ने खेती कर दी है। यह हाल बांसी नदी का भी है। करीब 50 किलोमीटर लंबी इस नदी के दोनों तरफ खेती शुरू हो गई है। नदी का कैचमेंट एरिया अब 100 मीटर से भी कम बचा है। लगातार बढ़ते इस अतिक्रमण के चलते कई जगह तो इनका अस्तित्व भी संकट में दिखाई दे रहा है। लोग इनके गहरे किनारे को काटकर समतल करते जा रहे हैं। जल संकट के चलते इनमें बड़ी-बड़ी झाड़ियां उग आई हैं।