गुरवलिया बाजार(कुशीनगर)। पूर्वांचल से बिहार के रास्ते बंगाल तक पशुओं की तस्करी हो रही है। मुजफ्फरनगर, शामली, रामपुर, मेरठ आदि जगहों से बड़ी मात्रा में पशुओं को कंटेनर में लादकर ला रहे हैं। इसके बाद गोरखपुर के साथ महाराजगंज, हाटा और कुशीनगर में उतारकर इन्हें एक-एक कर बिहार बॉर्डर के पार पहुंचाया जा रहा है। इसमें पिकअप का सबसे अधिक इस्तेमाल किया गया है। माध्यम बनती है। पशुओं को बिहार तक पहुंचाने के लिए तस्कर अपनी गाड़ी का इस्तेमाल करने के बजाए या तो पिकअप चुरा ले रहे हैं या चारा और सामान की ढुलाई के नाम पर भाड़े पर इसे लेकर तस्करी को अंजाम देते हैं। पुलिस के हत्थे चढ़ने के बाद ऐसे मामले सामने आएं हैं।
बिहार के रास्ते बंगाल तक होने वाली पशुओं की तस्करी में कुशीनगर की भौगोलिक परिस्थिति का योगदान तो है ही, इसके अलावा यहां के तस्कर भी इसमें महती भूमिका अदा करते हैं। बिहार की सीमा से लगे थानों के साथ तुर्कपट्टी, पटहेरवा क्षेत्र में भी तस्कर सक्रिय हैं। सूत्रों के मुताबिक तस्करी की ढुलाई का माध्यम बनी पिकअप की व्यवस्था कर पशुओं को बिहार लाने की जिम्मेदारी जिले के गैंग लेते हैं। इसके लिए पहले वह जिन जगहों पर पिकअप होती है, वहां के मालिक से चारा, चोकर, समान आदि की ढुलाई के बहाने पिकअप की मांग करते हैं और इसके एवज में माह के 12 से 15 हजार तक गाड़ी मालिक के खातों में भेज देते हैं। पिकअप मिलने के बाद ड्राइवर भी उनके होते हैं और संचालन भी वही करते हैं। ऐसे में रातों रात, भोर और समय की नजाकत का फायदा उठाते हुए चारे के बहाने पशुओं की ढुलाई होती रहती है।
जब गाड़ी किसी भी मुखबिर की सूचना या जांच में पकड़ी जाती है तो जांच की आंच गाड़ी मालिक तक पहुंचती है। जब मालिक तक ये सूचना पहुंचती है तबतक देर हो चुकी होती है और गाड़ी जब्ती हो जाती है। इतना ही नहीं उन्हें कानूनी प्रक्रिया का भी सामना करना पड़ता है। कुछ ऐसे ही कहानी दो माह पूर्व तुर्कपट्टी थाना क्षेत्र में देखने को मिली थी। जब एक गांव के पिकअप मालिक से युवकों ने चारे की ढुलाई के लिए लंबे समय के लिए पिकअप लिया। कुछ माह पूर्व उक्त पिकअप पशुओं के साथ हाटा क्षेत्र में पकड़ा तो गाड़ी मालिक को इसका अंदाजा हुआ। यह इकलौता मामला नहीं है सूत्रों के मुताबिक जिले के जिन इलाकों में गाड़ी के तौर पर लोगों के पास पिकअप हैं, उनसे तस्कर किसी तीसरे को माध्यम बनाकर बात में फंसाते हैं और फिर 12 से 15 हजार माह का देकर यह एक खेप पशुओं को अंजाम तक पहुंचाने के लिए इस्तेमाल कर इतने रुपये लेकर भरपाई कर लेते हैं।
-पशु या शराब तस्करी में शामिल गाड़ियां पकड़े जाने के बाद इसकी जांच होती है। जांच में वाहन चालक पर भी केस दर्ज होता है। किराए पर देने वाले वाहन मालिकों को भी इसको लेकर सतर्क रहना चाहिए। पूर्व में तस्करी में शामिल ऐसे कई वाहन पकड़े गए हैं, जिनके वाहन नंबर के साथ-साथ चेचिस नंबर में भी छेड़छाड़ की गया है। गिरफ्तार आरोपियों के पूछताछ में बताने के बाद जांच कर कार्रवाई की जाती है।
अमित सक्सेना, सीओ, तमकुहीराज
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हर माह पहुंच जाती है खाते में रकम
दरभंगा, मुजफ्फरपुर आदि स्थानों पर अंडरग्राउंड होकर पशुओं को पूर्वांचल के इलाकों से लाकर बिहार की सीमा तक लाने का फरमान स्थानीय बड़े तस्करों तक पहुंचता है। सूत्रों के मुताबिक, इसके लिए बड़े तस्कर पिकअप के लिए एक निर्धारित व्यक्ति को टास्क देते हैं। इसके बाद पिकअप गाड़ी मालिक की व्यवस्था की जाती है। इनसे संपर्क कर पैसे की लालच में इनसे गाड़ी ले ली जाती है और फिर इससे पशुओं की तस्करी की जाती है। जबतक किसी मामले में गाड़ी पकड़ा न जाए, किसी को इसकी भनक नहीं लगती। सूत्रों ने बताया कि तस्करी का यह ट्रेंड लंबे समय से चल रहा है। इसके लिए पुलिस को तफ्तीश की जरूरत हैं।
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मुखबिरी मिली तो ठीक वरना पश्चिम से पूरब पहुंच मंसूबे को अंजाम दे रहे गोतस्कर
अंतरराज्यीय स्तर पर पशुधन तस्करी करने वाले धंधेबाजों के लिए जिले का राष्ट्रीय राजमार्ग शुरू से ही सुरक्षित साबित होता रहा है। जिले के गोवंश भी खतरे में है। यहां पुलिस को अगर मुखबिरी मिली तो कुछ बात बन जाए वरना तस्कर उत्तर प्रदेश के ''''पश्चिमी छोर'''' मुज्जफरनगर, शामली, रामपुर आदि जगहों से निकलकर ''पूरब'' में स्थित बिहार और बंगाल की खाड़ी तक पहुंच अपने मंसूबे में कामयाब हो जाते हैं। आलम ये है कि कुशीनगर में हर महीने ऐसे तस्करों का पुलिसिया तंत्र से सामना होता है, लेकिन इनकी जड़ खत्म न होने से यह फिर पनप जाते हैं। हर साल पशु तस्करी के मामले लगातार सामने आ रहे हैं। कहीं से मुखबिरी मिली तो मुठभेड़ में या तो पशु बरामद हो जाते हैं। किस्मत अच्छी रही तो एक-दो तस्कर या चालक हाथ लग जाते हैं। वरना तस्कर अपने लक्ष्य में कामयाब हो जाते हैं। पुलिस भी सिर्फ एफआईआर दर्ज करने तक की कागजी कार्रवाई कर पाती है।
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