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न नावों का किराया मिला, न नाविकों को मिली मजदूरी

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न नावों का किराया मिला, न नाविकों को मिली मजदूरी
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खड्डा। प्रभावित गांवों में बाढ़ के समय राहत कार्यों और लोगों को आने-जाने के लिए लगाई गईं नावों का अब तक न किराया मिला, न ही नाविकों को मजदूरी मिली। कुछ वर्ष पहले ग्राम पंचायतों के धन से नाव की आपूर्ति की गई थी। कमीशनबाजी में खरीदी गई नाव चलने योग्य थी ही नहीं। गुणवत्ता ठीक न होने के कारण कई नाव सड़ गईं। ऐसी दशा में अगर अब बाढ़ आई तो समस्या बढ़ सकती है।
खड्डा तहसील क्षेत्र के गंडक नदी पार बसे मरचहवा, बसंतपुर, शिवपुर, हरिहरपुर, नरायनपुर आदि गांवों में जून से लेकर अक्तूबर तक बाढ़ से प्रभावित रहते हैं। इन गांवों को आपस में जोड़ने वाली सड़कों पर पानी भर जाने से लोगों को नाव से ही आना जाना पड़ता है। मरचहवा दक्षिण टोला व उत्तर टोला तथा बसंतपुर के लोग तो बिना नाव के सोहगीबरवा या अन्य स्थान पर जा ही नहीं पाते हैं।
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पिछले पंचायत कार्यकाल में इन गांवों सहित नदी किनारे के गांवों के लिए नाव खरीदारी पंचायतराज विभाग ने कराई थी। बताया जाता है कि स्थानीय स्तर पर नावों की खरीदारी कराने या बनवाने के बजाय कमीशन के चक्कर में बाराबंकी आदि जगहों से नावों की आपूर्ति कराई गई, जो चलने योग्य नहीं थीं। मरचहवा गांव के प्रधान इजहार अंसारी एवं ग्रामीण नथुनी, विरेंद्र, नंदू, मुंशी आदि बताते हैं कि केवल नाव का ढांचा भेजकर प्रति नाव 27 हजार रुपये ग्राम सभा के खाते से ले लिए गए। दो नावें लाई गई थीं।
पानी में उतारते ही सुराख होने के चलते दोनों डूब गईं। एक दिन भी नहीं चलीं। प्रधान बताते हैं कि पिछली बार बाढ़ के समय प्रशासन के आदेश पर लोगों की सुविधा के लिए भाड़े पर छोटी नावों को रखा गया था। उन्हें चलाने के लिए नाविक भी थे। उनका भुगतान तहसील से होना है, जो अब तक नहीं हुआ। मानसून आने के बाद फिर से नावों की जरूरत पड़ जाएगी। ऐसे में कोई नाव देने और मांझी नाव चलाने के लिए तैयार नहीं दिखाई दे रहे हैं। तीस हजार लोगों को संकट का सामान करना पड़ सकता है।
स्थानीय स्तर पर भी बनती नाव तो मिलता रोजगार
स्थानीय स्तर पर नाव बनती तो लोगों को रोजगार मिलता एवं नाव भी सस्ती पड़ती, साथ ही ज्यादा चलती। वर्षों से नाव बना रहे अनुभवी कारीगर देनी शर्मा तथा नाव मालिक सत्तन, हरिशंकर सिंह, दिलीप, जगदीश, सर्वजीत आदि बताते हैं कि स्थानीय स्तर पर नाव बनी होती व सही देखभाल की जाती तो कम से कम 20 वर्ष तक लोगों के काम आती। स्थानीय कारीगर व लोगों को रोजगार मिलता तथा हर वर्ष भाड़े पर नाव नहीं लेनी पड़ती।
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यह मामला मेरे संज्ञान में नहीं था। पता कराया जाएगा कि भुगतान क्यों नहीं हुआ या किस वजह से रुका है। इसका शीघ्रातिशीघ्र समाधान कराने का प्रयास किया जाएगा।
- दिनेश कुमार, तहसीलदार खड्डा
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