कुशीनगर। बजट में प्रमुख बौद्ध स्थलों की दशा बदलने पर इस बार खासा जोर है। बुद्ध की धरा कुशीनगर विश्व पटल पर काफी विख्यात है। देश ही नहीं बल्कि विश्व के देशों में इस स्थल का ऐतिहासिक, धार्मिक व पुरातात्विक महत्व है। लेकिन, विकास के पथ पर अभी यहां काफी बदलाव की दरकार है।
स्थल महत्व के हिसाब से अब तक यहां का पर्यटन विकास नहीं हो सका है। जो योजनाएं चल रही हैं, वह पूरी होने का नाम नहीं ले रही हैं। वहीं ऐसे भी स्थल हैं, जहां अब तक जिम्मेदारों की नजर नहीं पड़ी हैं। बजट मिलने के बाद अगर इन पर ध्यान दिया जाए तो न सिर्फ यहां की दशा बदल जाएगी, बल्कि बुद्ध की यह धरती पर्यटकों को भी लुभाएगी और विकास के साथ रोजगार के भी अवसर पैदा होंगे।
केंद्र व प्रदेश सरकारें बौद्ध सर्किट के पर्यटन विकास को लेकर एक हजार करोड़ रुपये की ढेरों योजनाएं चला रही हैं। इनके तहत कुछ पर्यटन विकास के कार्य हुए भी हैं। मगर विदेशी पर्यटकों को लुभाने के लिए जिन चीजों की यहां उपलब्धता होनी चाहिए, वह अब भी मूर्त रूप नहीं ले सकी है। पर्यटकों को सुविधाएं मिलनी चाहिए वे नहीं मिल पाती है और विदेश के अलावा देश के अन्य शहरों से पहुंचने वाले पर्यटक चंद घंटों में भगवान बुद्ध का दर्शन कर यहां से दूसरे गंतव्य के लिए रवाना हो जाते हैं।
ऐसा भी नहीं है कि प्रयास से कुछ हुआ नहीं, परियोजनाएं आईं हैं, लेकिन यहां के महत्व की दृष्टि से यह नाकाफी है। अभी और प्रयास व वैश्विक स्तरीय पर्यटन विकास की दरकार है। यहां पर विकास कार्यों को पर्यटन विभाग ही नहीं, बल्कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग, कसाडा, नगरपालिका, विश्व बैंक, प्रदेश व केंद्र सरकार भी कुछ न कुछ लंबे समय से कर रही है। उनमें पथ प्रकाश, पाथवे, मेडिटेशन सेंटर, फूड प्लाजा, अत्याधुनिक सुविधाओं से युक्त शौचालय, परिक्रमा पथ, साउंड एंड लाइट शो, बौद्ध कालीन हिरण्यवती नदी की साफ-सफाई समेत अनेक विकास कार्य होते रहे हैं। कुछ धरातल पर उतरे, फिर भी पर्यटकों का उनसे कोई सरोकार नहीं है।
बुद्ध के कुशीनगर में निर्वाण की तीन प्रमुख वजह : कुशीनगर का इतिहास अयोध्या के राजा दशरथ के पुत्र श्रीराम से भी जुड़ा है। कुशावती के नाम से भगवान श्रीराम के पुत्र कुश की राजधानी रही है। इतिहासकार डाॅ. राजबली पांडेय की किताब गोरखपुर और क्षत्रिय जनजातियों के इतिहास में लिखा है कि कुश के बाद यह साम्राज्य लक्ष्मण के पुत्र चंद्रकांत को मिला।