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Navratri : शक्तिपीठ कड़ाधाम में भक्तों का लगा तांता, मां शीतला का भक्तों के किया दर्शन, गूंजे जयकारे

Thu, 03 Oct 2024 02:48 PM IST
विनोद सिंह संवाद न्यूज एजेंसी, कड़ा

सार

शक्तिपीठ कड़ाधाम मंदिर में देवी के जयकारों और घंटा घड़ियालों की गूंज दिन भर सुनाई देती रही। यहां पर कौशाम्बी, प्रतापगढ़, प्रयागराज के अलावा प्रदेश के कोने-कोने से भक्त अपनी मनोकामना लेकर आते हैं और देवी को हलवा, पूड़ी और अन्य पकवानों का भोग लगाते हैं। नवरात्र में यहां पर सर्वाधिक भीड़ होती है। 
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आदिशक्ति मां शीतला देवी। - फोटो : संवाद
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विस्तार
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कौशाम्बी के कड़ा में स्थित आदिशक्ति मां शीतला देवी मंदिर में भक्तों की भारी भीड़ रही। यहां सुबह से ही भक्तों का जयकारा शुरू हो गया। मंगला आरती के बाद दर्शन पूजन का दौर शुरू हो गया। यहां पर बड़ी संख्या में पुलिस और महिला सिपाहियों की ड्यूटी लगाई गई है। प्रसाद की दुकानों पर भारी भीड़ रही। देवी के जयकारों और घंटा घड़ियालों की गूंज दिन भर सुनाई देती रही। यहां पर कौशाम्बी, प्रतापगढ़, प्रयागराज के अलावा प्रदेश के कोने-कोने से भक्त अपनी मनोकामना लेकर आते हैं और देवी को हलवा, पूड़ी और अन्य पकवानों का भोग लगाते हैं। नवरात्र में यहां पर सर्वाधिक भीड़ होती है। 

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कड़ा 51 शाक्तिपीठ कडाधाम में नवरात्रि के प्रथम दिन शैलपुत्री स्वरूप की पूजा हुई और सुबह से ही कडाधाम के कुबरीघाट, कालेश्वरघाट आदि विभिन्न घाटो पर स्नान करके हाथो में नारियल, चुनरी, मिठाई ,हलवा,पूडी़ आदि लेकर दर्शन को घंटो अपनी बारी का इंतजार करते दिखे। नवरात्रि के प्रथम दिन शैलपुत्री माता की पूजा का विशेष महत्व बताया गया है जो भक्त पान के पत्ते पर लौंग सुपारी मिश्री रखकर मां शैलपुत्री को अर्पण करने से माता शैलपुत्री अपने भक्तों की समस्त मनोकामनाएं पूर्ण करती है और इस दिन उपासना से साधक को अनेक सिद्धियों की प्राप्ति होती हैं।

शैलपुत्री के रूप में पूजी गईं मां शीतला

मान्यता हैं कि पूर्व जन्म में शैलपुत्री का नाम सती था। सती के पिता दक्ष प्रजापति ने भगवान शिव का अपमान किया था। इसके बाद सती ने स्वयं को यज्ञ की अग्नि में भस्म कर लिया था। इसके बाद फिर से सती का पुनर्जन्म हुआ और वो शैलपुत्री स्वरूप में प्रकट हुईं और भगवान शिव से उनका विवाह हुआ। मां शैलपुत्री को सफेद वस्तु बहुत प्रिय है। इसलिए माता शैलपुत्री को सफेद वस्त्र, सफेद फूल, सफेद मीठे भोग लगाए जाते हैं। घी का दीपक जलाकर एक लाल चुनरी में पांच प्रकार के सूखे मेवे और देवी को अर्पित किया जाता है।

नवरात्रि के प्रथम दिन लौंग द्वारा ऊं शैलपुत्रये नमः मंत्र का 108 बार जाप करना चाहिए और जाप के बाद सारी लौंग को कलावे में बांधकर माला का स्वरूप देना चाहिए ऐसा करने से हर कार्य में सफलता  मिलती हैं और परिवार में सुख शांति मिलती हैं। नवरात्रि में मेला क्षेत्र में आने वाले श्रृध्दालू भक्तों को कोई तकलीफ न हो इसके लिए पुलिस प्रशासन द्वारा जगह जगह बैरिकेडिंग करा रखी थी और साथ ही साथ क्षेत्राधिकार सिराथू अवधेश विश्वकर्मा एवं थाना अध्यक्ष धीरेंद्र सिंह मेला क्षेत्र में चप्पे चप्पे पर निगाह बनाए रहे। 

कड़ा धाम में नवरात्रि के पहले दिन भीड इतनी ज्यादा थी कि उसको नियंत्रण करने के लिए पुलिस के पसीने छूट गए। हालांकि पुलिस ने मेला क्षेत्र के चारों तरफ बैरिकेडिंग करा रखी थी, इसलिए वाहन मेला क्षेत्र में तो प्रवेश नहीं कर पाए, लेकिन मेला क्षेत्र के बाहर चरही से लेकर फसाया तालाब तक देवीगंज से लेकर भैरवनाथ जी तक वाहनों का रेला लगा रहा।   जाम के स्थिति बनी रही गाड़ियां रेंगते हुए चल रही थी।

कड़कती धूप एवं प्रचंड गर्मी पर भी आस्था पड़ी भारी

इतनी गर्मी होने के बावजूद भी लोगों पैदल मां के जयकारे करते हुए डम तक पहुंचे और मां के दर्शन कर अपने को धन्य महसूस किया। जौनपुर से आए अवधेश गौतम एवं प्रयागराज से आए काशी यादव एवं राकेश पांडेय ने बताया की लगभग दो किलोमीटर से ज्यादा पैदल चलकर मां के दर्शन प्राप्त हुए। मां का दर्शन पाकर सारी थकान मिट गई।

कड़ा धाम मंदिर परिसर में किसी भी भक्त को दिक्कत ना हो इसलिए मंदिर प्रबंध समिति के अध्यक्ष आत्म प्रकाश पंडा और टिंकू पंडा ने लगभग समाज के 10 वॉलिंटियर मुस्तैद कर रखे थे। कमेटी के सभी पदाधिकारी मंदिर क्षेत्र में भ्रमण कर रहे थे। पंडा समाज के अध्यक्ष आत्म प्रकाश पंडा ने बताया कि हमारा प्रयास यही है कि किसी भी भक्त को किसी भी प्रकार की कोई दिक्कत न होने पाए, इसलिए मैं स्वयं मंदिर परिसर में मौजूद रहता हूं।
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51 शक्तिपीठों में एक कहा कड़ाधाम मां शीतला मंदिर

शीतला धाम कड़ापीठ सैकड़ों वर्षों से शक्ति उपासकों का केंद्र रहा है। स्कंद पुराण के अनुसार भगवान शिव की पत्नी सती ने पिता दक्ष के अपमान से आहत होकर यज्ञ कुंड में कूदकर प्राण त्याग दिए। उनके वियोग में क्रोधित भगवान शिव सती का मृत शरीर लेकर समस्त लोकों में भ्रमण करने लगे। शिव के क्रोध से बचने के लिए भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से देवी सती के मृत शरीर को 51 टुकड़ों में काट दिया। जहां-जहां सती के मृत शरीर के ये टुकड़े गिरे, वहां-वहां शक्तिपीठ की स्थापना हुई। कड़ा धाम वह स्थान है जहां सती का हाथ या चूड़ी (कड़ा) या हाथ गिरा था।

पहले इसको कर धाम फिर अपभ्रंश होकर कड़ाधाम कहा जाने लगा। माना जाता है कि द्वापर युग में पांडु पुत्र युधिष्ठिर अपने वनवास के दौरान इस मंदिर में दर्शन करने आए थे। उन्होंने गंगा तट पर शीतला देवी का मंदिर बनवाया। यहां चैत्र माह में कृष्ण पक्ष की अष्टमी को देवी शीतला की पूजा करने से बुरी शक्तियां दूर रहती हैं। इस मंदिर का निर्माण वर्ष 1000 में हुआ था। यहां माता शीतला देवी का स्थान है। इन्हें पूर्वांचल की कुलदेवी कहा जाता है , जिसके चलते यहां 12 महीने पूर्वांचल के सभी जिलों से श्रद्धालु भारी संख्या में आते हैं।
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