हवेली से शुरू होता है फाग
कस्बे में होली के गायन की शुरुआत सबसे पहले जमींदार की हवेली से होता है। इसके बाद अलग-अलग मोहल्ले में होली का पर्व मनाया जाता है। पहले दिन चावलमंडी, दूसरे दिन बताशा मंडी, तीसरे दिन ठठेरी बाजार, चौथे दिन अंजहाई बाजार, पांचवें दिन कपड़ा मंडी, छठे दिन गुड़ मंडी के बाद आखिरी दिन सरायअकिल कोतवाली में होली खेलकर लोग पर्व का समापन करते हैं।
एक दिन पहले जमींदार कराते थे मुनादी
जिस मोहल्ले में होली खेलनी होती थी वहां एक दिन पहले जमींदार जालिम सिंह मुनादी कराते थे। उस दिन कस्बे के बच्चे, बड़े, बुजुर्ग शामिल होकर रंगोत्सव का आनंद लेते थे और एक दूसरे के गले मिलकर त्योहार की बधाई देते थे। यह क्रम सप्ताह भर तक चलता था। मुनादी से लोगों को पता चल जाता था कि आज किस मोहल्ले में होली होगी।
कस्बा में पहले दिन नही होती है होली
ब्रिटिश हुकूमत से होली की परंपरा में पहले दिन कस्बा में होली नही खेली जाती है, हर दिन की तरह बाजार खुली रहती है। स्थानीय लोगों के अनुसार होली के पहले दिन गांवों में रंग खेला जाता था। गांव से भी जमींदार घराने में होली मिलने के लिए लोग आया करते थे। इसलिए होली के दूसरे दिन से सप्ताह भर होली खेली जाती है।
1950 तक थी जमींदारों के हाथ होली की कमान
1950 तक होली की परंपरा जमींदारों के हाथ में थी। जमींदारी खत्म होने के बाद कस्बा के लोग स्वतंत्रता के साथ आज भी सात दिन की होली मनाते हैं। हालांकि बदलते समय के साथ होली खेलने का स्वरूप भी बदलता जा रहा है। अब लोग रंग लगाने के बहाने कपड़ा फाड़ने को ज्यादा तरजीह देते हैं।
आकर्षण का केंद्र रहती है तमेरों की पिचकारी
चायल के पूर्व विधायक एवं वर्तमान चेयरमैन शिवदानी बताते है कि ब्रिटिश हुकूमत के समय कस्बा में तमेरों की संख्या 75 फीसदी थी। पीतल के बर्तनों का बड़ा कारोबार होता था, लेकिन आज इनकी संख्या घटकर मात्र 30 घर तक सीमित हो गई है। उस समय होली खेलने के लिए पीतल की पांच फिट लंबी पिचकारी निकलती थी। पिचकारी देखने के लिए गांवों से लोग आते थे। आज भी होली में पीतल की पिचकारी आकर्षण का केंद्र रहती है।