कटरा व रक्सवारा के लोगों का गुरुवार का दिन चर्चाओं में बीता। किसने क्या किया? और कौन क्या नहीं कर पाया? इसी बतकही में युवा व बुजुर्गों ने सुबह से शाम बिता दी। मामूली बात पर उठे गुस्से के उफान ने सालों पुराने रिश्तों को चूर कर दिया है। अब दोबारा सब एक होंगे अथवा नहीं। आशा और निराशा के भंवर जाल में फंसे लोग इस गंभीर मसले पर फिलहाल अभी मंथन कर रहे हैं।
कटरा व रक्सवारा के लोग गुरुवार को अलग-अलग जगहों पर इकट्ठा बैठे थे और अपनी ही बात में मशगूल थे। वह खुलकर तभी बोलते थे, जब वह मुतमईन हो जाते थे कि उनकी बात किसी दूसरे तक नहीं पहुंचेगी और न ही आसपास पुलिस है।
गांव के मो. आजम, गुलाब वारिस और मुश्ताक अहमद मानते हैं कि रास्ते के विवाद का हल तो था? नासमझी से बखेड़ा हुआ। कहा कि यदि थोड़ा और वक्त मिला होता तो शायद यह नौबत ही न आती। बताया कि इसके पहले ऐसा तो कभी नहीं हुआ था। गांव के ही रामबहादुर मौर्य, राजकुमार और सोनू केशरवानी भी मानते हैं कि जतन तो किया जा सकता था, लेकिन सब आवेश में गड़बड़ हो गई। एक रास्ते के लिए सबके अपने अलग-अलग रास्ते हो गए हैं। कुछ प्रशासन की गलती थी तो कुछ अपनों की।