कासगंज। गर्भावस्था में हर खतरा लक्षणों के साथ सामने आए, यह जरूरी नहीं। बढ़ा हुआ ब्लड प्रेशर, एनीमिया या यूरिन में प्रोटीन जैसी समस्याएं कई बार बिना संकेत के ही मां और गर्भस्थ शिशु के लिए जोखिम बढ़ा देती हैं। ऐसे छिपे खतरों को समय रहते पकड़ने के लिए पहली तिमाही से नौवें माह तक नियमित एएनसी जांच जरूरी है। कम से कम चार चरणों में होने वाली इन जांचों से मां की सेहत के साथ बच्चे की विकास स्थिति पर भी लगातार नजर रखी जाती है।
स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. अंजू के अनुसार, पहली एएनसी जांच सबसे महत्वपूर्ण होती है। गर्भावस्था की पुष्टि होते ही ब्लड प्रेशर, हीमोग्लोबिन, ब्लड शुगर, एचबीएसएजी, वीडीआरएल, एचसीवी और एचआईवी की जांच कराई जाती है। इसके साथ सीबीसी, यूरिन आरएम और एबीओ-आरएच ब्लड ग्रुप की जांच होती है। रिपोर्ट के आधार पर आगे की निगरानी और उपचार तय किया जाता है।
चौथे से छठे माह में दूसरी जांच के दौरान गर्भस्थ शिशु के विकास के साथ मां के ब्लड प्रेशर और हीमोग्लोबिन की स्थिति देखी जाती है। जरूरत के अनुसार, अल्ट्रासाउंड कराया जाता है। सातवें-आठवें माह में तीसरी जांच में हाई रिस्क प्रेग्नेंसी और अन्य जटिलताओं की पहचान पर जोर रहता है। नौवें माह की जांच में बच्चे की स्थिति, प्रसव की संभावित तारीख और मां-बच्चे के स्वास्थ्य का आकलन कर सुरक्षित संस्थागत प्रसव की तैयारी की जाती है।
हर माह चार दिन विशेष जांच
प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान के तहत जिले के स्वास्थ्य केंद्रों और जिला अस्पताल में हर माह 1, 9, 16 और 24 तारीख को गर्भवती महिलाओं की विशेष जांच व चिकित्सकीय परामर्श दिया जाता है। तेज सिरदर्द, धुंधला दिखाई देना, अचानक सूजन, तेज पेट दर्द, रक्तस्राव या बच्चे की हलचल कम होना गंभीर संकेत हो सकते हैं। ऐसी स्थिति में जांच की निर्धारित तारीख का इंतजार न कर तत्काल चिकित्सकीय सहायता लेनी चाहिए।
-
वर्जन
जिला अस्पताल में एएनसी जांच के लिए प्रतिदिन 30 से 40 महिलाएं आती हैं। इनमें करीब 10 प्रतिशत में ब्लड प्रेशर और 25 प्रतिशत में एनीमिया सामने आता है। एचआईवी की जांच भी महत्वपूर्ण है। - डॉ. संजीव सक्सेना, सीएमएस, जिला अस्पताल