बीएससी के लिए कानपुर आना पड़ा, तब समझ में आया कि गरीबी क्या होती है। कई-कई दिन खाने को नहीं मिलता था। तब ट्यूशन पढ़ाकर अपना और अपने परिवार का पेट पाला और बीएससी तक पढ़ाई की।
इस तरह मिली प्रेरणा
आदित्य बताते हैं कि ट्यूशन पढ़ाने के दौरान बहुत से ऐसे बच्चे आए जो फीस नहीं दे सकते थे। अब उनसे फीस न लें तो खुद भूखे सोना पड़ता था और फीस के लिए जोर डालें तो बच्चे छोड़कर चले जाते थे। इस पीड़ा से उन्हें गरीब बच्चों को साक्षर बनाने की प्रेरणा मिली।
1992 में इस साक्षरता अभियान को कानपुर के रावतपुर इलाके से शुरू किया। पांच साल तक अलग-अलग झोपड़ियों में रहने वाले बच्चों को पढ़ाया। लोग उन्हें दान स्वरूप कुछ पैसे दे देते तो उसी से भोजन और कपड़ों का इंतजाम कर लेते। फुटपाथ पर चादर बिछाकर कहीं भी सो जाते थे।
युवाओं से बच्चों को पढ़ाने की करते हैं प्रार्थना
आदित्य बताते हैं कि कानपुर के बाद अन्य जिलों में उन्होंने यह अभियान शुरू किया। जिस क्षेत्र से गुजरते हैं, वहां फुटपाथ पर रहने वाले बच्चों की तलाश करते हैं। फिर उस क्षेत्र के पढ़े-लिखे युवाओं से संपर्क कर उन्हें एक या दो घंटे पढ़ाने की प्रार्थना करते हैं। वे कुछ दिन रुककर कक्षाएं संचालित करवाते हैं। उसके बाद आगे निकल जाते हैं। उनके इस कार्य पर डिस्कवरी चैनल ने एक घंटे का एपिसोड भी बनाया है।
मैं बच्चों के लिए हर शहर में स्कूल नहीं खोल सकता, लेकिन अपने जैसे लोगों को पढ़ाने के लिए प्रेरित जरूर कर सकता हूं। ऐसे बुजुर्गों की तलाश करता हूं जो सरकारी सेवा से रिटायर हुए हों। उनसे बच्चों के लिए कुछ समय निकालने की प्रार्थना करता हूं। बहुत से लोग मान जाते हैं और वर्षों तक कक्षाएं चलाते रहते हैं। हर गरीब बच्चे को साक्षर करने के प्रयास में जुटा हूं। - आदित्य कुमार