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Labour Day: इत्र कारखाना में काम करने वाले मजदूरों का हाल-बेहाल, कारखाना संचालक तो कारोबार के बूते कर रहे कमाई

Mon, 01 May 2023 01:18 PM IST
शिखा पांडेय तारिक इकबाल, अमर उजाला, कन्नौज

सार

यूपी के कन्नौज जिले में इत्र का कारोबार तो फल-फूल रहा है लेकिन कारखाने में काम करने वाले मजदूरों का हाल बेहाल है। कारखाने में काम करने वालों के लिए आम मजदूरों की तरह दिहाड़ी ही है। पूरे दिन काम करने के बाद वह बमुश्किल उतना ही कमा पाते हैं, जितने में घर का खर्च चल सके। पढ़ें खास रिपोर्ट...
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कारखाना में काम करते मजदूर - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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दुनिया भर में खुशबू फैलाने के लिए मशहूर इत्रनगरी का एक अलग और मार्मिक पहलू भी है। इत्र के कारोबार से जुड़े कारोबारी तो मेहनत के बूते नाम और दाम कमा रहे हैं, लेकिन उनके कारखाने में काम करने वाले कारीगरों के साथ ऐसा कुछ नहीं है। उनका हाल-बेहाल है। गुजर-बसर भी खेत में काम करने वाले या मकान-दुकान के निर्माण में लगे मजदूरों जैसा ही होता है।

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कन्नौज में इत्र बनाने का काम सदियों से होता चला आ रहा है। यहां कई बड़ी फर्म हैं, जिनके यहां तैयार इत्र को देश के अलग-अलग हिस्सों में काफी पसंद किया जाता है। उनकी मांग विदेशों में भी है। ताजगी के लिए शरीर पर लगाने के साथ ही अलग-अलग पकवानों में भी यहां के तैयार खुशबू का इस्तेमाल होता है। मिठाई से लेकर अगरबत्ती और पान मसाला में भी यहां का खुशबू इस्तेमाल किया जाता है। शहर और आसपास के सैकड़ों गांव की अर्थव्यवस्था इसी कारोबार पर टिकी है। छोटे-बड़े कारोबारी इस कारोबार से जुड़े हैं।

पीढ़ियों से कर रहे काम, नहीं बदली तकदीर
शहर के इत्र कारखानों में काम करने वाले कई कारीगरों की पीढ़ियां अलग-अलग फर्म में काम करती रहीं। उनकी नई पीढ़ी भी इसी काम में जुटी है। बदले में उन्हें मिलती आम मजदूरों की तरह दिहाड़ी ही है। पूरे दिन काम करने के बाद वह बमुश्किल उतना ही कमा पाते हैं, जितने में घर का खर्च चल सके। परिवार बड़ा होने पर एक दिन की दिहाड़ी भी कम पड़ जाती है।

इत्र के कारोबार का अर्थशास्त्र
- 350 से ज्यादा कारखाने हैं कन्नौज में।
- 25 बड़ी इंडस्ट्री में होता है इत्र बनाने का काम।
- 250-300 हैं इत्र के माइक्रो कारखाने।
- 60 से ज्यादा देशों में होता है इत्र का निर्यात।
- 30 फीसदी से ज्यादा का कारोबार विदेशी बाजार में।
- 20 हजार से ज्यादा किसान करते हैं फूलों की खेती।
- 5000 से ज्यादा कारीगर जुटे हैं कारखानों में।
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- शहर के करीब सड़ियापुर निवासी जगतराम ने बताया कि वह मजदूरी करता है। अक्सर इत्र कारखाने में बुलाया जाता है। उसे एक दिन का 300 रुपये ही मिलता है। दूसरा काम करने पर भी एक दिन में इतनी ही मजदूरी मिलती है।

- शहर के मकरंदनगर निवासी बॉबी ने बताया कि वह इंडस्ट्रियल एरिया के इत्र कारखाने में काम करता है। उसे अलग-अलग काम में लगाया जाता है। एक दिन में 300 रुपये ही मिलते हैं। उसके परिवार के कई और लोग भी कारखानों में दिहाड़ी पर काम करते हैं।

- श्रम प्रवर्तन अधिकारी नवनीत श्रीवास्तव ने बताया कि श्रम कल्याण परिषद की ओर से श्रमिकों के लिए कई योजनाएं संचालित हैं। इसका लाभ उन्हीं मजदूरों को मिलता है, जिनका रजिस्ट्रेशन है। कारखानों में काम करने वाले उन्हीं कारीगरों या मजदूरों को लाभ मिलता है, जिनका कारखाना विभाग में फैक्ट्री एक्ट के तहत रजिस्टर्ड है। वहां काम करने वाले जिन कर्मचारियों की मजदूरी 15 हजार रुपये मासिक से कम है, उन्हें उनके बच्चों की पढ़ाई, बेटी की शादी, बीमारी का इलाज के लिए खर्च मिलता है। यहां बहुत कम ही कारखाने रजिस्टर्ड हैं।

- शहर के होली मोहल्ले में इत्र कारखाना चलाने वाले कारोबारी आशीष पांडेय ने बताया कि उनके यहां जो भी कर्मचारी काम करते हैं, वह सभी परिवार का हिस्सा हैं। उन्हें उनकी वास्तविक मजदूरी देने के साथ ही किसी परेशानी या जरूरत पर भी हर मुमकिन मदद की जाती है। किसी का उत्पीड़न या शोषण नहीं किया जाता है। अगर मजदूरों को परेशान किया जाएगा तो वह काम ही करने नहीं आएंगे।
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