उनकी जगह अब सूक्ष्म, लघु और मध्यम इकाइयों ने ली है। वे अब श्रमिकों-कर्मचारियों को रोजगार देने का यह सबसे बड़ा जरिया हैं। मौजूदा समय में शहर में 54690 इकाइयां खुल चुकी हैं। इसमें 2,43,967 श्रमिक काम कर रहे हैं। जल्द ही रमईपुर मेगा लेदर क्लस्टर की नींव पड़ने के बाद एक लाख से ज्यादा लोगों को और प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष तौर पर रोजगार मिल सकेगा। शहर का दादानगर, पनकी, फजलगंज, रूमा, चौबेपुर बड़े औद्योगिक हब बन चुके हैं। यहां पर दूध, साबुन, किचन मसाला, प्लास्टिक, फुटवियर, इंजीनियरिंग, पैकेजिंग, बिस्कुट, स्टील, पेन, खाद्य आदि की तमाम इकाइयां हैं। इनके उत्पाद निर्यात भी हो रहे हैं।
शहर मौजूदा समय में एमएसएमई का गढ़ बन चुका है। सबसे ज्यादा रोजगार यही क्षेत्र दे रहा है। चमड़ा कारोबार भी बढ़ रहा है। अब चमड़ा के गारमेंट और शेफ्टी शूज भी शहर में बनने लगे हैं। यह बड़ी उपलब्धि है। सैडलरी के 120 से ज्यादा भौगोलिक संकेतांक जीआई मिल चुके हैं। - राजीव कुमार जालान, राष्ट्रीय उपाध्यक्ष, चर्म निर्यात परिषद
सूती मिलों के बंद होने से शहर में उद्योगों के लिए वो निराशा का दौर था। एलएमएल और नागरथ पेंट जैसी बड़ी इकाइयां बंद होने लगी और एमएसएमई खुलने लगीं। कोई बड़ा निवेश न आने के बाद भी यहीं के उद्यमियों ने इकाइयों को शुरू किया। चकेरी, रूमा, इस्पातनगर नए औद्योगिक क्षेत्र बन रहे हैं। - सुनील वैश्य, पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष, आईआईए
मिलों के जरिए हजारों लोगों को रोजगार मिलता था। मिलें बंद हो चुकी हैं। सरकार ने कभी भी शहर में बड़ा उद्योग लगाने का प्रयास नहीं किया। शहर की पहचान यहां के उद्योगों से ही बनीं। अब एमएसएमई रोजगार दे रही हैं। हालांकि श्रमिकों की स्थिति बहुत अच्छी नहीं है। काम के घंटे बढ़ते जा रहे हैं और वेतन नहीं बढ़ रहा है।- राजेश कुमार शुक्ला, महामंत्री, ईपीएफ पेंशनर्स एसोसिएशन, उत्तर प्रदेश, कानपुर