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Labour Day 2023: श्रमिकों की मेहनत से कानपुर कहलाया मैनचेस्टर ऑफ द ईस्ट, खुल चुकी हैं 4690 इकाइयां

Mon, 01 May 2023 10:36 AM IST
शिखा पांडेय न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कानपुर

सार

मैनचेस्टर ऑफ द ईस्ट कहे जाने वाला कानपुर श्रमिकों का मनपसंद शहर बन गया। इन मिलों में तीन पालियों में कपड़ों का उत्पादन होता था। तीन पाली में एक मिल में लगभग चार से पांच हजार मजदूर काम करते थे। श्रमिकों के लिए श्रमिक कॉलोनियां बस्तीं चली गईं, जिनका अस्तित्व आज भी है। मजदूर दिवस पर पढ़ें खास खबर...
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सांकेतिक तस्वीर - फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार
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24 मार्च 1803 में ईस्ट इंडिया कंपनी ने कानपुर को जिला घोषित किया था। समय बीता और कानपुर एक औद्योगिक नगरी के तौर पर विकसित होने लगा। अन्य शहरों से काम की तलाश में आए श्रमिकों को यहां की कपड़ा मिलों में रोजगार मिलने लगा। ब्रिटिश इंडिया कारपोरेशन और नेशनल टेक्सटाइल कारपोरेशन के अधीन लाल इमली, म्योर मिल, एल्गिन मिल एक और दो, कानपुर टैक्सटाइल, लक्ष्मी रतन कॉटन मिल, अथर्टन मिल, विक्टोरिया मिल, स्वदेशी कॉटन मिल की नींव पड़ी और इन मिलों के उत्पादों ने धूम मचाई।

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मैनचेस्टर ऑफ द ईस्ट कहे जाने वाला कानपुर श्रमिकों का मनपसंद शहर बन गया। इन मिलों में तीन पालियों में कपड़ों का उत्पादन होता था। तीन पाली में एक मिल में लगभग चार से पांच हजार मजदूर काम करते थे। श्रमिकों के लिए श्रमिक कॉलोनियां बस्तीं चली गईं, जिनका अस्तित्व आज भी है। इसके अलावा निजी क्षेत्र की जेके कॉटन, जूट मिल में हजारों की संख्या में श्रमिक काम करते थे। हालांकि यह सभी मिलें अब बंद हो चुकी हैं।

उनकी जगह अब सूक्ष्म, लघु और मध्यम इकाइयों ने ली है। वे अब श्रमिकों-कर्मचारियों को रोजगार देने का यह सबसे बड़ा जरिया हैं। मौजूदा समय में शहर में 54690 इकाइयां खुल चुकी हैं। इसमें 2,43,967 श्रमिक काम कर रहे हैं। जल्द ही रमईपुर मेगा लेदर क्लस्टर की नींव पड़ने के बाद एक लाख से ज्यादा लोगों को और प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष तौर पर रोजगार मिल सकेगा। शहर का दादानगर, पनकी, फजलगंज, रूमा, चौबेपुर बड़े औद्योगिक हब बन चुके हैं। यहां पर दूध, साबुन, किचन मसाला, प्लास्टिक, फुटवियर, इंजीनियरिंग, पैकेजिंग, बिस्कुट, स्टील, पेन, खाद्य आदि की तमाम इकाइयां हैं। इनके उत्पाद निर्यात भी हो रहे हैं।

शहर मौजूदा समय में एमएसएमई का गढ़ बन चुका है। सबसे ज्यादा रोजगार यही क्षेत्र दे रहा है। चमड़ा कारोबार भी बढ़ रहा है। अब चमड़ा के गारमेंट और शेफ्टी शूज भी शहर में बनने लगे हैं। यह बड़ी उपलब्धि है। सैडलरी के 120 से ज्यादा भौगोलिक संकेतांक जीआई मिल चुके हैं। - राजीव कुमार जालान, राष्ट्रीय उपाध्यक्ष, चर्म निर्यात परिषद

सूती मिलों के बंद होने से शहर में उद्योगों के लिए वो निराशा का दौर था। एलएमएल और नागरथ पेंट जैसी बड़ी इकाइयां बंद होने लगी और एमएसएमई खुलने लगीं। कोई बड़ा निवेश न आने के बाद भी यहीं के उद्यमियों ने इकाइयों को शुरू किया। चकेरी, रूमा, इस्पातनगर नए औद्योगिक क्षेत्र बन रहे हैं। - सुनील वैश्य, पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष, आईआईए

मिलों के जरिए हजारों लोगों को रोजगार मिलता था। मिलें बंद हो चुकी हैं। सरकार ने कभी भी शहर में बड़ा उद्योग लगाने का प्रयास नहीं किया। शहर की पहचान यहां के उद्योगों से ही बनीं। अब एमएसएमई रोजगार दे रही हैं। हालांकि श्रमिकों की स्थिति बहुत अच्छी नहीं है। काम के घंटे बढ़ते जा रहे हैं और वेतन नहीं बढ़ रहा है।- राजेश कुमार शुक्ला, महामंत्री, ईपीएफ पेंशनर्स एसोसिएशन, उत्तर प्रदेश, कानपुर

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श्रमिकाें की शहर में स्थिति
- 2011 से अस्तित्व में आए उप्र भवन एवं सन्निर्माण योजना के तहत 31 मार्च तक 5,85,361 श्रमिक पंजीकरण करा चुके हैं। वित्तीय वर्ष 2022-2023 में 34751 श्रमिकों ने पंजीयन कराया।
- असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों के लिए 24 अगस्त 2021 से ई-श्रम पंजीयन शुरू किया गया। मौजूदा समय में इसमें 15 लाख 50 हजार 332 श्रमिक पंजीकृत हैं।
- संगठित क्षेत्र में 65 हजार श्रमिकों का पंजीकरण श्रम विभाग में है।

नंबर गेम
- 54690 इकाइयां शहर में खुल चुकी हैं।
- 2,43,967 श्रमिक कर रहे हैं औद्योगिक इकाइंयों में काम
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