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बिकरू कांड: कमजोर विवेचना से खजांची जय बाजपेई दो मुकदमों में बरी, जानें कौन से मामले में हुआ दोषमुक्त

Sat, 09 Mar 2024 08:48 AM IST
हिमांशु अवस्थी न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कानपुर

सार

Kanpur News: शस्त्र लाइसेंस मामले में अभियोजन ने कोर्ट में बताया कि जय के खिलाफ 12 और रजय के खिलाफ सात मुकदमे दर्ज हैं। जय के खिलाफ पहला मुकदमा वर्ष 2020 में बजरिया थाने में लूट का दर्ज हुआ था। रजय के खिलाफ जिस मुकदमे का तर्क दिया गया उसकी एफआईआर या चार्जशीट भी कोर्ट में पेश नहीं की गई।
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जय बाजपेई - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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कानपुर में  बिकरू कांड के मुख्य अभियुक्त विकास दुबे का खजांची कहे जाने वाले जयकांत बाजपेई को कानपुर की विशेष मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत ने शुक्रवार को दो मुकदमों में बरी कर दिया। इसमें एक झूठा शपथपत्र देकर लाइसेंस लेने और दूसरा कारतूसों का मामला है। कारतूस के बारे में सिर्फ भाई रजय से पूछा गया। घर के अंदर जाकर जांच नहीं की गई। वहीं, लाइसेंस मामले में रजय पर दर्ज मुकदमे की चार्जशीट पेश नहीं की गई और 2006 में जय की शादी के बाद परिवार की परिभाषा बदल गई।

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इसका लाभ जय बाजपेई को मिल गया। हालांकि अभियोजन की ओर से एक मुकदमे में सेशन कोर्ट में अपील भी दाखिल कर दी गई है और दूसरे में तैयारी चल रही है। अभी माती की अदालत से गैंगस्टर मामले में दोषसिद्ध होने के बाद जय दस साल की सजा माती जेल में काट रहा है। झूठा शपथपत्र देकर अभिलेखों में कूटरचना व आपराधिक इतिहास छिपाकर शस्त्र लाइसेंस लेने के मामले में जयकांत बाजपेई के खिलाफ 19 नवंबर 2020 को बजरिया थाने में तत्कालीन थाना प्रभारी राममूर्ति यादव ने रिपोर्ट दर्ज कराई थी।

अभियोजन की ओर से छह गवाह पेश किए गए थे। तर्क था कि जय के भाई रिंकू उर्फ रजयकांत बाजपेई के खिलाफ वर्ष 1999 में बजरिया थाने में मारपीट व धमकाने का मुकदमा दर्ज हुआ था। इसकी जानकारी जय ने शपथपत्र में नहीं दी और परिवार का आपराधिक इतिहास छिपाकर शस्त्र लाइसेंस लिया। जय की ओर से तर्क रखा गया था कि उसे शस्त्र लाइसेंस आठ जनवरी 2008 को मिला था।  उस समय तक उसके खिलाफ कोई मुकदमा दर्ज नहीं था। वर्ष 2006 में उसकी शादी हुई थी।

भाई रजय ने जय का शस्त्र लाइसेंस दिखाया था
कानूनन उसके परिवार में पत्नी व बच्चे आते हैं और उनके खिलाफ भी कोई मुकदमा दर्ज नहीं था। इसलिए झूठा शपथपत्र देकर आपराधिक इतिहास छिपाने का आरोप गलत है। इसी तरह, एसआई अवनीश कुमार वर्मा ने 20 जुलाई 2020 को बजरिया थाने में जय के खिलाफ आर्म्स एक्ट के तहत रिपोर्ट दर्ज कराई थी। इसमें कहा था कि 18 जुलाई को वह जय के घर शस्त्र लाइसेंस व कारतूसों की जांच करने के लिए गए, तो भाई रजय ने जय का शस्त्र लाइसेंस दिखाया, जिसमें 65 कारतूस आवंटित थे।

दोनों ही मामलों में अभियोजन कोर्ट में पक्ष साबित नहीं कर सका
कारतूस के बारे में रजय कुछ नहीं बता सका। इस पर कारतूस अपराधियों को देकर दुरुपयोग करने के मामले में जय के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कराई गई। इसमें तीन शस्त्र विक्रेताओं समेत आठ गवाह कोर्ट में पेश किए गए। बचाव पक्ष की ओर से जय की पत्नी श्वेता बाजपेई को गवाह के रूप में कोर्ट में पेश किया गया था। तर्क रखा था कि जय उस समय जेल में बंद था, जब श्वेता उससे मिलने जेल में गई तो उसने बताया था कि अलमारी के लॉकर में कारतूस रखे हैं। घर लौटकर श्वेता ने कारतूस निकाले और अदालत में पेश कर दिए थे। दोनों ही मामलों में अभियोजन कोर्ट में पक्ष साबित नहीं कर सका और जय को कोर्ट ने दोषमुक्त करार दे दिया।

विवेचना में खामियां

कारतूस मामला: भाई से पूछताछ की...घर की तलाशी नहीं ली
अभियोजन का पक्ष था कि जय को 65 कारतूस आवंटित हुए थे, उनके इस्तेमाल के बारे में जानकारी नहीं दी गई। कारतूस किसी और को दिए गए थे। जय की पत्नी कोर्ट में कहीं और से कारतूस लाई है। बचाव पक्ष का तर्क था कि जय को लाइसेंस 8 जनवरी 2008 को जारी हुआ था। लाइसेंस 31 दिसंबर 2020 तक वैध था। 12 साल में 65 कारतूस खरीदे गए। सभी कारतूस अलमारी में रखे थे जिन्हें कोर्ट में पेश कर दिया गया। खोखा जमा करके कारतूस दिए जाने का नियम वर्ष 2015 में आया था। दो शस्त्र विक्रेताओं ने बयान में कहा है कि खोखे देकर कारतूस लिए गए थे। कोर्ट ने माना कि बिना जांच रिपोर्ट दर्ज कर ली। सही विवेचना नहीं की गई। न तो यह जानने की कोशिश की गई कि कारतूस किसे दिए गए और न ही उससे कारतूस बरामद किए गए। वादी मुकदमा ने सिर्फ रिपोर्ट दर्ज कराकर जांच विवेचक पर छोड़ दी और विवेचक ने मान लिया कि वादी ने जांच पड़ताल करके ही रिपोर्ट दर्ज कराई है। इसलिए तथ्यों की सही जांच नहीं की। कारतूस के बारे में सिर्फ रजय से पूछा गया। घर के अंदर जाकर जांच नहीं की गई।

शस्त्र लाइसेंस मामला: चार्जशीट कोर्ट में पेश नहीं की
शस्त्र लाइसेंस मामले में अभियोजन ने कोर्ट में बताया कि जय के खिलाफ 12 और रजय के खिलाफ सात मुकदमे दर्ज हैं। जय के खिलाफ पहला मुकदमा वर्ष 2020 में बजरिया थाने में लूट का दर्ज हुआ था। रजय के खिलाफ जिस मुकदमे का तर्क दिया गया उसकी एफआईआर या चार्जशीट भी कोर्ट में पेश नहीं की गई। पारिवारिक सदस्यों के विवरण के रूप में वर्ष 2004 में बना जय की मां का राशन कार्ड दाखिल किया गया, जिसमें जय व रजय के नाम हैं। लेकिन वर्ष 2006 में जय की शादी हो गई और उसके परिवार की परिभाषा बदल गई। कोर्ट ने कहा कि शस्त्र लाइसेंस सिर्फ शस्त्र रखने और इस्तेमाल करने की शक्ति देता है, इसे चल-अचल संपत्ति नहीं माना जा सकता। इसलिए बेईमानी से संपत्ति प्राप्त करने का आरोप भी साबित नहीं होता। एसआईटी रिपोर्ट के आधार पर एफआईआर दर्ज कराने की बात कही गई, लेकिन किसी भी गवाह ने एसआईटी रिपोर्ट को कोर्ट में साबित नहीं किया।

कारतूस मामले में जय की जमानत अर्जी के दौरान श्वेता बाजपेई की ओर से दिए गए शपथपत्र में कहा गया था कि 45 कारतूस और 20 खोखे उनके पास हैं। जबकि कोर्ट में दिए बयान में सभी 65 कारतूस पेश किए गए। श्वेता ने कोर्ट में झूठा बयान दिया और कारतूस कहीं और से लाकर पेश किए। इन तथ्यों को सेशन कोर्ट में अपील के दौरान रखा गया है। जिला जज की अदालत में सुनवाई 9 अप्रैल को होगी। दूसरे मामले में भी अपील की तैयारी की जा रही है।   -दिलीप अवस्थी, डीजीसी क्रिमिनल
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जय मामले में अभियोजन की लचर पैरवी का फायदा कोर्ट में मिला। मेरी शिकायतों के आधार पर ही एसआईटी जांच में जय के कारनामों का खुलासा हुआ था। अभियोजन अधिकारियों के लापरवाही बरतने की शिकायत उच्चाधिकारियों से की गई है। कानपुर में चल रहे गैंगस्टर मामले में भी लापरवाही बरती जा रही है।  -सौरभ भदौरिया, अधिवक्ता
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