जानकार बताते हैं कि कंपनी के पास पूरा डाटा रहता है कि सिम कौन से मोबाइल में इस्तेमाल हो रहा है। आईएमईआई नंबर से ट्रेस होता है। इसके बावजूद कंपनी ने कार्रवाई नहीं की।
कंपनी के रिकॉर्ड से ही खुला फर्जीवाड़ा
क्राइम ब्रांच ने जब 20 हजार रुपये की साइबर ठगी की जांच की तो ठगों का केवल मोबाइल नंबर ही उपलब्ध था। लोकेशन राजस्थान में मिली। लेकिन उसमें आईडी कानपुर की लगी थी। जब क्राइम ब्रांच ने पता किया कि ये नंबर किस मोबाइल से एक्टिव हुआ तो वह आरोपियों का निकला।
इस मोबाइल की आईएमईआई नंबर का विवरण खंगाला तो पता चला कि इससे कई हजार सिम एक्टिव किए गए। तब आरोपी पकड़े गए और गिरोह का राजफाश हुआ। हैरानी की बात ये है कि पूरा डाटा क्राइम ब्रांच को टेलीकॉम कंपनी से ही मिला।
एक शख्स की फोटो पर 500-500 सिम एक्टिव
आरोपियों ने एक शख्स की फोटो लगाकर नाम व पता बदलकर सैकड़ों आधार कार्ड बनवाए। इन आधार कार्ड को लगाकर सिम एक्टिव किए। यहां पर भी कंपनी सवालों के घेरे में है। इतने सारे नंबरों में तस्वीर एक और नाम पता बदला हुआ था तो संबंधित अधिकारी व कर्मचारियों ने इस पर सवाल क्यों नहीं खड़े किए। कंपनी की इन सभी खामियों व लापरवाहियों का आरोपियों ने बखूबी फायदा उठाया।
यह भी रही बड़ी खामी
अधिकतर टेलीकॉम कंपनियों का सिम लेने पर बायोमीट्रिक लिया जाता है। इससे ग्राहक का पूरा विवरण ऑनलाइन कंपनी के पास पहुंच जाता है। लेकिन, वीआई जो सिम दे रही है उसमें बायोमीट्रिक नहीं लिया जा रहा है। ये एक बड़ी तकनीकी खामी है। इसी खामी का फायदा आरोपियों ने उठाया।