इसी दौरान जब दरोगाओं के तबादले हुए तो उसमें दयाशंकर का भी नाम शामिल था। यहां से उसे चौबेपुर थाने भेजा गया। इसके बाद थाने बदलते रहे और वह दरोगा ही रहा। कई चौकियों का प्रभारी भी बना।
विभागीय अफसरों की लापरवाही या मिलीभगत
दयाशंकर जब दरोगा बना तब केस भी चल रहा था। आज तक किसी अफसर व विभाग के बाबू ने इस पर सवाल नहीं खड़े किए। अब ये जांच का विषय है कि वक्त के साथ अफसर बदलते गए लेकिन फर्जीवाड़े पर कोई कार्रवाई क्यों नहीं हुई। इसमें लापरवाही है या किसी की मिलीभगत।
हत्या के प्रयास, दुष्कर्म, लूट जैसे मामलों की जांच की
दयाशंकर ने दरोगा स्तर की करीब 150 केसों की विवेचनाएं कीं। हत्या के प्रयास, दुष्कर्म, लूट जैसे गंभीर मामले भी शामिल हैं। इन विवेचनाओं को करने का उसका अधिकार नहीं था।
"मुझे खुद नहीं पता कैसे दरोगा पद पर प्रमोशन दे दिया। साजिशन ऐसा किया गया। जिसकी मैंने उच्चाधिकारियों से शिकायत भी की थी।" - दयाशंकर वर्मा, एसीपी
"अभी मामला संज्ञान में नहीं है। संबंधित अधिकारी से इस संबंध में जानकारी ली जाएगी। जो भी तथ्य सामने आएंगे उस आधार पर जांच कर कार्रवाई की जाएगी।"
- आनंद प्रकाश तिवारी, ज्वाइंट पुलिस कमिश्नर, कानून व्यवस्था