पराली (कृषि अवशेष) और बचा हुआ व खराब पिज्जा, समोसा, दाल, चावल, रोटी-सब्जी, कटे हुए फल और सब्जियों के अवशेषों से ग्रीन हाईड्रोजन बनाने की तैयारी है। डॉ. आंबेडकर इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी फॉर दिव्यांगजन (एआईटीडी) के विशेषज्ञ ‘डार्क फर्मेंटेशन’ तकनीक से गैस विकसित करेंगे, जिसके लिए उत्तर प्रदेश विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद की ओर से 13.36 लाख रुपये का अनुदान मिला है। यह शोध तीन साल तक चलेगा।
वायु प्रदूषण की प्रमुख वजह पराली का जलना है। इसके जलने से पीएम 2.5, पीएम 10, कार्बन डाइऑक्साइड, कार्बन मोनोऑक्साइड, नाइट्रोजन डाइऑक्साइड, नाइट्रोजन ऑक्साइड, सल्फर डाइऑक्साइड जैसी हानिकारक गैसें निकलती हैं। इस समस्या को दूर करने के साथ ही भविष्य के ईंधन ग्रीन हाईड्रोजन पर काम किया जा रहा है। बायोटेक्नोलॉजी विभागाध्यक्ष एवं डीन आरएंड डी डॉ. मनीष सिंह राजपूत ने बताया कि परियोजना का उद्देश्य कृषि अवशेषों (जैसे पराली) और खाद्य अपशिष्ट से ‘डार्क फर्मेंटेशन’ तकनीक के माध्यम से ग्रीन हाइड्रोजन का उत्पादन करना है।
इस तकनीक की खास बात यह है कि इसमें सूक्ष्मजीवों की मदद से बिना प्रकाश के कचरे को सीधे हाइड्रोजन में परिवर्तित किया जा सकता है। इससे न केवल ऊर्जा उत्पादन की लागत कम होगी, बल्कि पराली जलाने से होने वाले प्रदूषण और फूड वेस्ट की समस्या का भी समाधान मिलेगा। पारंपरिक ग्रीन हाइड्रोजन उत्पादन में महंगे उपकरण और अधिक बिजली की आवश्यकता होती है। सह-अन्वेषक डॉ. ओमहरी हैं। संस्थान की निदेशक प्रो. रचना अस्थाना और अन्य संकाय सदस्यों ने उपलब्धि पर टीम को बधाई दी।
तीन साल में विकसित होगा पायलट मॉडल
डॉ. राजपूत ने बताया कि तीन वर्षीय इस परियोजना में हाइड्रोजन उत्पादन की दक्षता बढ़ाने, उपयुक्त बैक्टीरिया के चयन और पायलट स्तर के बायो-रिएक्टर डिजाइन पर काम किया जाएगा। सफल परिणाम मिलने पर इसे औद्योगिक स्तर पर लागू किया जा सकता है।
किसानों से लिया जाएगा कृषि अवशेष
विशेषज्ञों के मुताबिक कृषि अवशेष आसपास के किसानों और सीएसए विश्वविद्यालय से लिया जाएगा। खाद्य अपशिष्ट के लिए संस्थान में संचालित मेस और अन्य संस्थानों के मेस से संपर्क किया जाएगा।