यह बात धीरे-धीरे चर्चा का विषय बन गई। आसपास के लोग जमा हो गए और यहां पूजा-अर्चना का सिलसिला शुरू हो गया। इसके साथ लोगों ने फोटो, वीडियो बनाना शुरू कर दिया। उनका कहना है कि यह आशीर्वाद है जो उन्हें जोत के रूप में मिल रहा है।
वैज्ञानिक रूप से जोत का यह हो सकता है कारण
पुराने पेड़ों में राल या रेजिन गोंद जैसा हाइड्रोकार्बन द्रव्य होता है। जो वृक्षों की छाल और लकड़ी से निकलता है। वैसे यह रेजिन अन्य पेड़ों की तुलना में चीड़ जैसे कोणधारी (कॉनिफरस) पेड़ों से अधिक मात्रा में निकलता है। रेजिन का प्रयोग गोंद, लकड़ी की रोगन (वार्निश), सुगंध और अगरबत्तियां बनाने के लिए सदियों से होता आया है। कभी-कभी रेजिन जमकर पत्थरा बन जाता है और बड़े डलों का रूप ले लेता है। जो समय के साथ जमीन में दफन हो जाते हैं।
सालों साल बाद यह कहरुवे (ऐम्बर) के नाम से बहुमूल्य पत्थरों की तरह निकाले जाते हैं और आभूषणों में इस्तेमाल होते हैं। बताया जाता है कि आग के संपर्क में आने से इसमें आग लग जाती है और यह अगर लगातार जलती रहे, तो पेड़ का जीवन नष्ट हो सकता है। हम यह मान सकते हैं कि यह गोंद पेड़ की अपनी सुरक्षा की ताकत होती है।