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Kanpur: बीबीए, बीफार्मा छात्र कर रहे साइबर ठगी, अंतरराज्यीय गिरोह के सात सदस्य गिरफ्तार

Sun, 06 Oct 2024 10:27 PM IST
शिखा पांडेय न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कानपुर

सार

Kanpur News: पनकी, कल्याणपुर और बिठूर में दर्ज साइबर ठगी के मामलों की जांच में कानपुर पुलिस को सफलता मिली है। पुलिस ने अंतरराज्यीय गिरोह के सात सदस्यों को गिरफ्तार किया है।
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पुलिस गिरफ्त में आरोपी - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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पनकी, कल्याणपुर और बिठूर थाने में दर्ज साइबर ठगी के मामलों की जांच कर रही कानपुर पुलिस ने लोगों से जालसाजी करने वाले अंतरराज्यीय गिरोह के सात सदस्यों को पनकी के ए टू जेड तिराहे के पास से गिरफ्तार किया है। बीबीए, बीफार्मा जैसी पढ़ाई कर रहे गैंग के सदस्य देशभर में घूम-घूमकर लोगों को अपना शिकार बनाते थे। हालांकि सरगना भागने में कामयाब रहा।
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ठगी गई रकम को हासिल करने और पुलिस को गुमराह करने के लिए जालसाजों ने पंजाब, झारखंड, कर्नाटक, गुजरात, हरियाणा, राजस्थान, आंध्रा प्रदेश समेत 10 प्रदेशों में करीब दो हजार लोगों के बैंक खातों को किराए पर ले रखा था। गिरफ्तार आरोपियों के पास से लैपटॉप, मोबाइल, लाखों रुपये व अन्य दस्तावेज मिले हैं। पकड़े गए आरोपियों में नारामऊ मंधना निवासी मनीष कुमार, आवास विकास एक कल्याणपुर निवासी दीपेंद्र सिंह गौर, पुराना शिवली रोड कल्याणपुर निवासी सुमित सिंह, अरौल के रौंगाव निवासी रोहित यादव उर्फ युवी, फ्रेंड्स कालोनी भरथना रोड इटावा निवासी पवन कुमार, कश्यपनगर बंबा रोड कल्याणपुर निवासी रोहन सिंह सेंगर और कानपुर देहात के रसूलाबाद के जिताई का पुरवा गांव निवासी अभय प्रताप सिंह शामिल हैं।
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वहीं, फरार सरगना की पहचान गौतमबुद्धनगर निवासी इक्का भाटी उर्फ तनुज के रूप में हुई है। पुलिस की एक टीम इक्का और गैंग के बाकी शातिरों की तलाश में जुटी है। डीसीपी पश्चिम राजेश कुमार सिंह ने बताया कि आरोपियों को रविवार दोपहर कोर्ट में पेश किया गया। वहां से न्यायिक हिरासत में जेल भेजा गया है।

 
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गरीब लोगों के किराए पर लेते थे बैंक खाते
डीसीपी ने बताया कि शुरुआती जांच में पता चला है कि इस गिरोह के सदस्य कभी पुलिस अधिकारी बनकर तो कभी नौकरी का झांसा देकर लोगों को ठगते थे। आवाज बदलने के लिए वाॅइस चेंजर ऐप का इस्तेमाल करते थे। ठगी गई रकम ठेले-ठेलिया लगाने और आर्थिक रूप से कमजोर तबके के लोगों के बैंक में खुलवाए खातों में जमा कराते और निकाल लेते थे। बदले में खाताधारकों को दो से पांच हजार रुपये दे देते थे।
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