इन नेताओं ने हासिल किए 40 फीसदी से ज्यादा वोट
- 1971 में कांग्रेस के सत्य नारायण मिश्र को 40.91 फीसदी
- 1984 में कांग्रेस से शीला दीक्षित को 41.44 फीसदी
- 1989 में जनता दल से छोटे सिंह यादव को 41.92 फीसदी
- 1998 में सपा के प्रदीप यादव को 42 फीसदी
- 1999 में सपा से मुलायम सिंह यादव को 42.63 फीसदी
- 2009 में सपा से अखिलेश यादव को 44 फीसदी
- 2014 में सपा की डिंपल यादव को 44 फीसदी
- 2019 में भाजपा के सुब्रत पाठक को 49.35 फीसदी
प्रतिशत के नजरिए से रामप्रकाश त्रिपाठी के नाम है सबसे बड़ी जीत
वोटों के अंतर से तो सबसे बड़ी जीत अखिलेश यादव के नाम है, जबकि प्रतिशत के नजरिए से यहां सबसे बड़ी जीत रामप्रकाशत त्रिपाठी के नाम दर्ज है। पहले जनसंघ और बाद में भाजपा के कद्दावर नेता रहे रामप्रकाश त्रिपाठी आपातकाल के बाद हुए 1967 के जनता लहर के दौरान हुए चुनाव में भारतीय लोकदल के टिकट पर लड़कर सांसद बने थे। उस चुनाव में उन्हें 287612 वोट मिले थे। जोकि कुल वोटों का 69.93 फीसदी था। कांग्रेस विरोधी लहर के दौरान उन्हें एकतरफा जीत मिली थी। उस चुनाव में उनके निकटतम प्रतिद्वंदी कांग्रेस के बलराम सिंह यादव को 28.34 फीसदी के साथ कुल 116570 वोट मिले थे। जीत-हार का अंतर 171042 प्रतिशत था।
दो ही बार सांसद फर्स्ट डिवीजन पास
- वर्ष 1971 में रामप्रकाश त्रिपाठी 69.93 फीसदी वोट
- वर्ष 2004 में अखिलेश यादव 62 फीसदी वोट
इत्रनगरी की तीन सबसे बड़ी जीत
- वर्ष 2004 में सपा के अखिलेश यादव ने बसपा के राजेश सिंह को 307373 वोट के बड़े अंतर से हराया।
- वर्ष 1971 में बीएलडी के रामप्रकाश त्रिपाठी ने कांग्रेस के बलराम सिंह यादव को 171042 वोट से हराया
- वर्ष 2009 में सपा के अखिलेश यादव ने बसपा के डॉ. महेशचंद्र वर्मा को 115864 वोटों से हराया
पिछले चुनाव में सुब्रत-डिंपल ने पार किया पांच लाख का आंकड़ा
वर्ष 2019 के लोसभा चुनाव में पहली बार ऐसा हुआ कि विजेता और उपविजेता दोनों ही उम्मीदवार ने पांच लाख वोटों का आंकड़ा पार कर लिया। पहली बार किसी चुनाव में किसी उम्मीदवार को पांच लाख से ज्यादा वोट हासिल हुए। चुनाव जीतने वाले भाजपा उम्मीदवार सुब्रत पाठक को 563087 वोट और चुनाव हारने वालीं सपा की डिंपल यादव को 550734 वोट मिले थे। दोनों के बीच जीत-हार का अंतर करीब एक प्रतिशत वोटों का था।