कानपुर। आजकल बच्चे फेल होने, कम नंबर आने या सेकेंड रैंक आने पर भी आत्महत्या जैसा आत्मघाती कदम उठा लेते हैं। इसलिए देखें कि एक सप्ताह से ज्यादा बच्चा उदास है, उसने बात करना बंद कर दिया है, झगड़ा करने लगा है या नशा करने लगा है। इस पर आपको बच्चे की निगरानी की जरूरत है। वह आत्महत्या जैसा कदम उठा सकता है। उसे काउंसलिंग की आवश्यकता है। यह सुझाव कानपुर साइकाइट्रिक सोसाइटी के महासचिव डॉ. गणेश शंकर ने अमर उजाला कार्यालय में बोर्ड परीक्षा परिणाम के बाद हुए संवाद कार्यक्रम में दिया।
डॉ. गणेश शंकर ने कहा कि माता-पिता अपने बच्चों से असफलता पर भी चर्चा करें। उनसे पूछें कि अगर वह परीक्षा में फेल हो गया तो क्या करेगा। बच्चा अगर कहे कि वह फेल नहीं होगा, ऐसा नहीं हो सकता, उसे किसी भी कीमत पर पास होना है। इस पर बच्चे का तुरंत मार्गदर्शन करें। उसे समझाएं कि अंकों से कुछ नहीं होता है। असफलता की कहानियां सुनाएं। मैं असफल हो गया इस विषय पर लेख लिखवाएं। इससे बच्चे की जिज्ञासा बाहर आएगी और आप अच्छी तरह से उसे समझा सकेंगे। सबसे पहले बच्चे को समझाएं कि यह अंतिम परीक्षा नहीं है। एक परीक्षा में असफलता जीवन का अंत नहीं होता है। यह सिर्फ एक पड़ाव है और आगे बढ़ने के कई मौके मिलेंगे।
नंबर कम आने पर न दें दोष
अभिभावक बच्चे के नंबर कम या फेल होने पर खुद को या बच्चों को दोष देना बंद करें। अपनी नकारात्मक भावनाओं को बच्चे पर न निकालें। इससे वह और भी ज्यादा निराश और हतोत्साहित महसूस करेगा। बच्चे को निराश होकर न बैठने दें। आगे की योजना बनाएं। खुद देखें कि कहां सुधार की आवश्यकता है। उसे सुधारें और बच्चे को आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करें। अपने बच्चों की तुलना दूसरों से न करें। अगर बच्चा बहुत ज्यादा निराश और तनावग्रस्त है तो उसे उसकी काउंसलिंग कराएं। ऐसे समय में बच्चों को देखें कि वे पर्याप्त नींद लें। स्वस्थ भोजन करें।
बच्चे को पढ़ाएं, लेकिन ज्यादा दबाव न डालें कि खेलना, टीवी देखना, घूमना बंद कर दें। उन्हें हर सुख से वंचित करना सही नहीं है। हां एक सिद्धांत दें कि आप सिर्फ आधा घंटा ही मोबाइल चला सकते हो। आप आधा घंटा खेल सकते हो, या घूम सकते हो। इससे बच्चा सामाजिक भी रहेगा और वह तनाव भी महसूस नहीं करेगा।