पढ़ने, बोलने और लिखने में सरल, सहज और सुगम भाषा है हिंदी। राष्ट्रभाषा की खासियत है कि जो हम बोलते हैं वही लिखते भी हैं जबकि प्रचलित भाषा अंग्रेजी में ऐसा नहीं है। इससे दूर भागने की बजाय इसे अपनाना चाहिए, इसकी आदत डालनी चाहिए। हिंदी बोलने या लिखने में शर्मिंदगी सही नहीं है। इस पर तो गर्व करना चाहिए।
यह विचार भारत सरकार के मुख्य स्थायी अधिवक्ता (चीफ स्टैंडिंग काउंसिल) कौशल किशोर शर्मा ने विशेष बातचीत में रखे। वर्ष 2000 से 2003 तक कोटक महिंद्रा बैंक, इंडसइंड बैंक, अशोक लेलैंड फाइनेंस लि., श्रीराम फाइनेंस लिमिटेड, सुंदरम फाइनेंस लिमिटेड समेत लगभग दो दर्जन कंपनियों के पंच (आर्बीट्रेटर) रहे कौशल ने सौ से ज्यादा निर्णय (अवार्ड) किए।
खास बात यह है कि ये सभी निर्णय हिंदी में ही लिखे गए। सभी बैंकों व फाइनेंस कंपनियों में ज्यादातर काम अंग्रेजी में ही होता है। अफसरों की भाषा भी अंग्रेजी में होती है लेकिन इन सबके बीच हिंदी में मजबूत पकड़ रखने वाले कौशल ने राष्ट्रभाषा का सम्मान बरकरार रखा। वर्तमान में कौशल डाक विभाग, आर्मी, एयरफोर्स, पांचों आर्डनेंस फैक्ट्री, एनडीआरएफ आदि कई विभागों के लिए अदालतों में केंद्र सरकार का पक्ष मजबूती से रखते हैं। अदालती कार्यवाही के दौरान हिंदी में ही बहस करते हैं और कागजात भी हिंदी में ही तैयार करते हैं।
भरी अदालत बेझिझक बोले, मुझे अंग्रेजी नहीं आती
वकालत की शुरुआत के दौरान वर्ष 1997-98 में पहला बड़ा मुकदमा मिला। सिविल जज सीनियर डिवीजन की अदालत में बहस के दौरान विपक्षी के अधिवक्ता ने अंग्रेजी में बहस सुनानी शुरू की। इसी बीच भरी अदालत में कौशल ने उन्हें टोकते हुए कहा कि हिंदी में बहस सुनाएं मुझे अंग्रेजी नहीं आती। यह सुनकर वहां मौजूद सभी अधिवक्ता हंस पड़े लेकिन बिना शर्मिंदगी, बेझिझक वह अपनी बात पर अड़े रहे और विपक्षी अधिवक्ता को मजबूरन हिंदी में बहस सुनानी पड़ी।