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ग्राउंड रिपोर्ट तिर्वा: सबसे छोटी विधानसभा सीट का सियासी रुतबा बरकरार, इस सीट पर भाजपा को मिलती है बढ़त

Sun, 05 May 2024 08:32 PM IST
शिखा पांडेय तारिक इकबाल, अमर उजाला, कन्नौज

सार

कन्नौज जिले की सबसे छोटी विधानसभा सीट तिर्वा पर सियासी सफर मुश्किल है। पहले उमर्दा के नाम से पहचानी जाने वाली सीट पर भाजपा को बढ़त मिलती है।
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तिर्वा मेडिकल कॉलेज के पास स्थित किसान बाजार - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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कहावत है देखन में छोटे लगे, घाव करे गंभीर...तिर्वा विधानसभा क्षेत्र में सियासी चेहरों के साथ कुछ ऐसा ही होता रहा है। भौगोलिक और मतदाताओं की संख्या के नजरिये से जिले की तीन विधानसभा सीट में सबसे छोटी सीट है तिर्वा, लेकिन इससे इसका सियासी रुतबा कम नहीं है। इसे कम करके आकने की भूल अक्सर नेताओं को गहरी चोट पहुंचाती है। औरेया और कानपुर देहात की सीमा से लगे इस विधानसभा क्षेत्र में वह सब सुविधाएं मुहैया हैं, जो अमूमन एक बड़े शहर में होने की कल्पना की जाती है।
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तिर्वा में राजकीय मेडिकल कॉलेज को बने हुए दो दशक होने को आए हैं। उस दौरान इस छोटे से इलाके में मेडिकल कॉलेज की बात करना अटपटा समझा जाता था। विकास का पहिया यहीं नहीं रुका। मेडिकल कॉलेज के बाद इसी से चंद किलोमीटर की दूरी पर राजकीय इंजीनियरिंग कॉलेज की स्थापना हुई। बाद में मेडिकल कॉलेज में ही कैंसर अस्पताल की विशाल इमारत बनकर तैयार हुई। उसी के पास कार्डियोलॉजी की शानदार इमारत को बने हुए भी सात साल से ज्यादा हो गए। यह अलग बात है कि यह दोनों ही अस्पताल अब तक सिर्फ देखने भर के ही हैं। कॉर्डियोलॉजी का संचालन शुरू नहीं हो सका है।

कैंसर अस्पताल में कुछ महीने पहले सिर्फ ओपीडी शुरू की गई है। स्टाफ नहीं मिलने से मेडिकल कॉलेज की टीम ही काम कर रही है। ग्रामीण क्षेत्र के युवाओं को मेडिकल में कॅरियर बनाने के लिए यहां पैरा मेडिकल कॉलेज भी बना हुआ है। किसानों को तकनीक से जोड़ने के लिए इस्राइल के वैज्ञानिकों की मदद से एक्सीलेंस सेंटर बना है। गोपालकों की आर्थिक हालत को बेहतर बनाने के लिए काऊ मिल्क प्लांट बना है। बजट के अभाव में यह करीब दो साल से बंद पड़ा है। फकीरेपुरवा में सोलर प्लांट बना था। उसे भी बंद हुए चार साल होने को है। सौरिख में बना स्टेडियम बदहाल पड़ा है।
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एक्सप्रेस-वे करीब होने से नजदीक हुए बड़े शहर
तिर्वा का शुमार जिले के पिछड़े इलाकों में होता रहा है। आगरा-लखनऊ एक्सप्रेस के बनने से इसका जुड़ाव बड़े शहरों से हो गया। तिर्वा के पास से ही गुजरे एक्सप्रेसवे से इलाके की कनेक्टिविटी बेहतर हुई है। अब तिर्वा से कानपुर, लखनऊ, आगरा, नोएडा, दिल्ली जाने के लिए जिला मुख्यालय की दौड़ नहीं लगानी पड़ती है। मेडिकल कॉलेज और इंजीनियरिंग कॉलेज के छात्र व स्टाफ के लिए भी एक्सप्रेसवे से काफी सहूलियत मिलती है।

लोधी बहुल क्षेत्र में पिछड़ी जातियों का दबदबा
तिर्वा विधानसभा क्षेत्र लोधी बहुल इलाका है। यहां क्षत्रिय, पाल, शाक्य वोटर भी निर्णायक भूमिका में हैं। यादव और गैर यादव पिछड़ी जातियों की संख्या उसके बाद आती है। प्रमुख वर्ग में मुस्लिम और ब्राह्मण वोटर की संख्या दूसरी विधानसभा के मुकाबले कम आंकी जाती है। तिर्वा कस्बे में वैश्य बिरादरी निर्णायक भूमिका में है। यहां से क्षत्रिय, पाल और लोधी बिरादरी के नेता विधायक बनते रहे हैं। पिछले तीन चुनाव के दौरान प्रमुख पार्टियों ने इसी बिरादरी के चेहरे पर दांव लगाया है। भाजपा यहां लोधी मतदाताओं के बूते चुनावी राह आसान करने की जुगत में है। उसे क्षत्रीय और ब्राह्मण वोटों के साथ गैर यादव वोटों से आस है। सपा भी यादव और मुस्लिम वर्ग के परंपरागत वोटरों के साथ इस सीट पर पाल बिरादरी को पाले में करने में लगी है। इस बार लोधी बिरादरी का साथ लेने के लिए भी जतन हो रहा है। बसपा भी काडर वोट के भरोसे पैठ बनाने में जुटी है।

अवंती बाई की प्रतिमा बनी सियासी मुद्दा
चुनाव के ऐलान से ठीक पहले यहां रानी अवंतीबाई लोधी की नई लगी प्रतिमा ने सियासी विवाद का रूप ले लिया है। प्रतिमा लगाने का मकसद तो समाज की गोलबंदी का था, लेकिन इसके लिए कानूनी औपचारिकता की अनदेखी करने ने भाजपा को उलझा दिया। बिना मंजूरी के लगी प्रतिमा को प्रशासन ने सख्ती दिखाते हुए कुछ ही घंटे में हटवा दिया। इसे लेकर विवाद हुआ। बाद में कानूनी औपचारिकताओं को उसी जगह पर स्थापित किया गया। लेकिन प्रशासन के दबाव में प्रतिमा हटवाने की बात भड़के समाज के नेताओं ने भाजपा नेताओं से नाराजगी भी जताई। सपा ने इस मुद्दे को लपककर प्रतिमा लगवाने की मांग की। स्थापना हुई तो सपा से जुड़़े लोगों ने भी पैदल यात्रा निकालकर रानी अवंतीबाई के जयकारे लगाए। भाजपा ने डैमेज कंट्रोल के लिए जनसभा कर उन्नाव से सांसद साक्षी महाराज को बुलाया। बाद में सपा मुखिया अखिलेश यादव ने इसे लेकर बड़ा बयान दिया। उन्होंने रसूलाबाद की हवाई पट्टी और तिर्वा में बने पैरा मेडिकल कॉलेज का नाम रानी अवंतीबाई लोधी के नाम पर करने का ऐलान कर दिया। नामांकन के बाद निकले पहले रोडशो में उन्हाेंने समर्थकों के हुजूम के साथ प्रतिमा पर माल्यार्पण किया और भाजपा नेताओं पर कटाक्ष किया। चुनाव के दौरान दोनों ही मंच से यह मामला जोरशोर से उठाया जा रहा है।

 

अखिलेश दो जनसभा कर चुके, भाजपा भी लगा रही जोर
जातीय गोलबंदी वाली इस सीट के सियासी रुतबे का अंदाजा इसी से लगा सकते हैं कि अपने नामांकन के बाद अखिलेश यादव अब तक जिले में दो बार आए हैं। दोनों ही बार उन्होंने अपना कार्यक्रम इसी विधानसभा क्षेत्र में किया है। नामांकन के दो दिन बाद 27 अप्रैल को रोडशो लेकर तिर्वा विधानसभा क्षेत्र ही पहुंचे थे। उसके पांच दिन बाद तीन मई को जब वह दूसरी बार जिले में आए तो इसी विधानसभा क्षेत्र तो तरजीह देते हुए यहां के हसेरन कस्बे में जनसभा की। अखिलेश यादव की इस सक्रियता पर भाजपा भी निगाह लगाए है। उसकी ओर से कई छोटी-बड़ी सभा हो चुकी है। आगे भी कई और कार्यक्रम का खाका तैयार हो रहा है।

क्षेत्र के अहम मुद्दे
- फकीरेपुर्वा में सोलर प्लांट बंद पड़ा है
- उमर्दा ब्लॉक में बने काऊ मिल्क प्लांट में ताला
- तिर्वा में रोडवेज बस स्टैंड की हालत जर्जर, नहीं जातीं बसें
- हसेरन ब्लॉक को तहसील बनाने का काम ठंडे बस्ते में
- ठठिया के पास बना इत्र पार्क अब तक नहीं हो सका शुरू

कॉलेज-अस्पताल बदहाल
- मेडिकल कॉलेज में संसाधन का अभाव
- पैरा मेडिकल का संचालन सही तरीके से नहीं
- कैंसर अस्पताल में नहीं मिल रही सुविधा
- कार्डियोलॉजी की इमारत खा रही धूल
- इंजीनियरिंग कॉलेज में छात्रों के लिए पर्याप्त हॉस्टल नहीं

 

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पिछले दो लोकसभा चुनाव के नतीेज
- 2014 में सपा को 94455 वोट, भाजपा को 102486, बसपा को 18862 वोट मिले
- 2019 में सपा को 100420 वोट, भाजपा को 115778 वोट मिले, बसपा चुनाव नहीं लड़ी

पिछले तीन विधानसभा चुनाव के नतीजे
- 2022 में भाजपा को 106089 वोट मिले, सपा को 101481 वोट, बसपा को 23092 वोट
- 2017 में भाजपा को 100426 वोट मिले, सपा को 76217 वोट, बसपा को 32036 वोट
- 2012 में भाजपा को 32302 वोट मिले, सपा को 78391 वोट, बसपा को 45899 वोट

तिर्वा विधानसभा क्षेत्र के वोटर

कुल वोट: 381279
पुरुष: 204559
महिला: 176698
थर्ड जेंडर: 22

यह बना रहे अपनी पार्टी का माहौल

तिर्वा विधानसभा क्षेत्र से चार बार विधायक बनने का मौका हासिल कर चुके कैलाश राजपूत जिले में लोधी बिरादरी का बड़ा चेहरा माने जाते हैं। एक बार बसपा से विधायक रहे कैलाश राजपूत पिछला लगातार दो चुनाव भाजपा से जीते हैं। अपनी बिरादरी को साधने की जिम्मेदारी इन पर ही टिकी है। जमीनी जुड़ाव रखने के कारण दूसरी बिरादरी में भी पकड़ रखते हैं। भाजपा की योजनाओं को लेकर जनता के बीच जा रहे हैं।

सपा के टिकट से 2022 का विधानसभा चुनाव लड़ चुके इंजी. अनिल पाल अपनी बिरादरी के साथ ही पिछड़े वर्ग की दूसरी बिरादरी को भी साधने में लगे हैं। उनके पिता स्व. विजय बहादुर पाल क्षेत्र के कद्दावर नेता रह हैं। उनकी गिनती मुलायम सिंह यादव के करीबियों में रही है। शिक्षा मंत्री रहे हैं। अनिल पाल उनकी ही विरासत को आगे बढ़ाते हुए सपा की साइकिल को रफ्तार देने में जुटे हैं। सपा शासन के दौरान क्षेत्र में हुए विकास को गिनाते हुए अब भाजपा पर अनदेखी का आरोप लगा रहे हैं।

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