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Exclusive: आयुध निर्माणियों का अस्तित्व खत्म, बनीं कंपनी, तीन कंपनियों के हेडक्वार्टर कानपुर में, नाम भी बदला

Tue, 17 Aug 2021 12:32 PM IST
प्रभापुंज मिश्रा अमित अवस्थी, अमर उजाला, कानपुर

सार

शहर की सबसे पुरानी कंपनी ओईएफ भी शामिल है। इन कंपनियों के सीएमडी के नाम पहले ही घोषित किए जा चुके हैं। तीनों कंपनियों के मुख्यालय शहर में हैं। शहर में सबसे पुुरानी निर्माणी ओईएफ है।
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आयुध निर्माणी कानपुर - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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अंग्रेजों के जमाने से शहर में स्थापित आयुध निर्माणियों का अस्तित्व खत्म हो गया। शहर की सबसे पुुरानी आयुध उपस्कर निर्माणी (ओईएफ), आयुध निर्माणी कानपुर (ओएफसी), फील्डगन, आयुध पैराशूट निर्माणी (ओपीएफ) और लघु शस्त्र निर्माणी (एसएएफ) 14 अगस्त से कंपनी बन गई। इन सभी कंपनियों का पंजीकरण रजिस्ट्रार ऑफ कंपनीज (आरओसी) में कराया गया। आरओसी कानपुर में पंजीकरण के साथ ही आयुध निर्माणियों के नाम भी बदल गए हैं। ओपीएफ का नया नाम ग्लाइडर्स इंडिया लिमिटेड हो गया है।
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इसी तरह आठ निर्माणियों को शामिल करके बनाई गई कंपनी का नया नाम एडवांस वेपन एंड इक्विपमेंट इंडिया लिमिटेड रखा गया है। इसमें ओएफसी, फील्डगन और एसएएफ समेत पांच अन्य आयुध निर्माणी शामिल हैं। इसके अलावा चार आयुध निर्माणियों को शामिल करके बनाई गई कंपनी का नया नाम ट्रुप कम्फर्ट लिमिटेड रखा गया है। इसमें शहर की सबसे पुरानी कंपनी ओईएफ भी शामिल है। इन कंपनियों के सीएमडी के नाम पहले ही घोषित किए जा चुके हैं। तीनों कंपनियों के मुख्यालय शहर में हैं। शहर में सबसे पुुरानी निर्माणी ओईएफ है।

इसकी स्थापना 1859 में एक्सपेरिमेंटल हारनेस डिपो के रूप में की गई थी। कानपुर और लखनऊ को जोड़ने वाले पुराने गंगापुल के किनारे स्थित इस निर्माणी को किला भी कहा जाता है। 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की गवाह इस निर्माणी के एक किनारे पर नानाराव पेशवा का महल है और उसमें पानी के जहाज वाली बड़ी नावों के लंगर आज भी सुरक्षित हैं। नानाराव पेशवा ने यहीं से बिठूर तक गंगा किनारे सुरंग का निर्माण कराया था। इस सुरंग में एक साथ दो घुड़सवार आ जा सकते थे।
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प्रथम संग्राम के बाद वर्ष 1859 में तत्कालीन ब्रिटिश सरकार ने कानपुर में सेना के लिए जूते और चमड़े के सामान की आपूर्ति के लिए द कानपोर इंट्रेचमेंट हारनेस डिपो के नाम से फैक्ट्री स्थापित की गई थी। 1862 में यहां देश की पहली टेनरी स्थापित की गई। इसके बाद ही कानपुर में चमड़ा उद्योग का विकास हुआ। 1969 में इसका नाम ओईएफ किया गया। 1965, 1971 और कारगिल युद्ध के दौरान इस निर्माणी ने सैन्य आपूर्ति में उल्लेखनीय योगदान दिया था।

 
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निमाणी में सेना के जवानों के लिए अलग-अलग प्रकार के टेंट, जूते और रसद से जुड़े उत्पाद बनाए जाते हैं। आयुध निर्माणी कानपुर की स्थापना 1942 को की गई थी। यहां पर धनुष, शारंग जैसी तोपों के अलावा टी-72, टी-90, अर्जुन टैंकों के बैरल बनाए जाते हैं। इसके अलावा 1965 और 1971 में भारत-पाकिस्तान युद्ध के बाद फील्ड गन फैक्ट्री की स्थापना की गई। आयुध पैराशूट निर्माणी की स्थापना 1941 में की गई थी। यहां पर अलग-अलग प्रकार के पैराशूट बनाए जाते हैं।

ओपीएफ दो सौ करोड़ की कंपनी
आरओसी में पंजीकृत ग्लाइडर्स लिमिटेड की कैपिटल वर्थ दो सौ करोड़ है। एडवांस वेपन एंड इक्विपमेंट इंडिया लिमिटेड की कैपिटल 15 हजार करोड़ है। इसमें आठ निर्माणियां शामिल की गई हैं। चार निर्माणियों को शामिल करके कंपनी बनीं ट्रुप कम्फर्ट लिमिटेड की कैपिटल चार हजार करोड़ है।

पहले नियुक्त हो चुके सीएमडी
अगस्त के पहले सप्ताह में प्रतिरक्षा संगठनों के विरोध के बीच रक्षा मंत्रालय ने बड़ा कदम उठाते हुए 41 आयुध निर्माणियों के विलय के बाद गठित सात कंपनियों के सीएमडी के नामों की घोषणा की थी। वीके तिवारी को पैराशूट कानपुर, राजेश चौधरी को वेपन एंड इक्विपमेंट कानपुर, संतोष कुमार सिन्हा को ट्रुप कम्फर्ट कंपनी कानपुर का सीएमडी बनाया गया है। सूत्रों ने बताया कि अब कंपनी का नामकरण होने के बाद जल्द ही सीएमडी अपना पदभार संभालेंगे।
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