विकास कार्य किए जाएं पर गंगा की धारा को न बिगाड़ा जाए। नदी अपना मूल स्वभाव कभी नहीं बदलती पर बांध धारा बदल देते हैं। गंगा के इतिहास को दरकिनार कर विकास कार्य कराने पर नदी भयावह रूप ले सकती है। ऐसे हुआ तो करोड़ों के विकास कार्यों पर पानी फिर सकता है।
यह बात आईआईटी के अर्थ एंड साइंस विभाग के वरिष्ठ वैज्ञानिक प्रो. राजीव सिन्हा ने कही। गंगा का स्वरूप पिछले 59 सालों में कितना बदला है, इसे दर्शाती हुई उनकी किताब गंगा एटलस: गंगा ऑफ द पास्ट का विमोचन दिल्ली में चल रहे गंगा उत्सव में जल शक्ति मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने किया।
उन्होंने किताब में 1960 और 2019 में दिखने वाली गंगा को सेटेलाइट चित्रों के माध्यम से दर्शाया है। हरिद्वार, बिजनौर, नरोरा, कानपुर, प्रयागराज, वाराणसी, पटना, भागलपुर और फरक्का में गंगा नदी में क्या परिवर्तन आया है, कितना परिवर्तन प्राकृतिक था और कितना मानवीय, इसका जिक्र किताब में किया गया है।
प्रो. राजीव ने बताया कि फरक्का और कानपुर में बैराज बनने से गंगा की धारा थोड़ी गड़बड़ हुई है। अधिक बालू जमा होने लगी है। स्मार्ट सिटी के निर्माण के दौरान यह बात अवश्य ध्यान में रखनी चाहिए कि जहां गंगा पहले थी, वहां दोबारा भी आ सकती है। उन्होंने कहा कि एटलस में इन सब बातों का जिक्र है। आईआईटी निदेशक प्रोफेसर अभय करंदीकर ने उन्हें बधाई दी है।