सोशल मीडिया से लॉबिंग करते हुए अपना एक बड़ा ग्रुप बनाने वाले मिसगाइड लड़कों की साजिश अपने ही देश को चोट पहुंचाने की थी। सीरिया से कंट्रोल हो रहे अलकायदा के खुरासान ग्रुप का नाम लेकर कानपुर-लखनऊ समेत आसपास के तमाम जिलों के कुछ लोकल लड़कों ने अपना एक ग्रुप बना रखा था। ये सभी आतंकी ग्रुप इस्लामिक स्टेट से भी प्रभावित हैं। एडीजी (एलओ) दलजीत सिंह चौधरी ने मंगलवार को ऐसा दावा किया है। चौधरी के मुताबिक सोशल मीडिया इन लड़कों का सबसे बड़ा हथियार बनी है। पुलिस का यह भी दावा था कि सोशल मीडिया के जरिए ही ये लोग एक-दूसरे के संपर्क में रहकर आतंकी घटनाओं की तैयारी कर रहे थे।
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‘खुरसान‘ ने किया मिसगाइड और लड़के बन गए आतंकवादी
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इस खुरसान ग्रुप से जुड़े सभी मिसगाइडेड लड़के आईएस की कार्यप्रणाली को फॉलो कर रहे थे। यूपी एटीएस के मुताबिक, कानपुर, लखनऊ और इटावा के संदिग्धों के ठिकानों से बरामद लैपटॉप, मोबाइल फोन और बड़ी संख्या में आईएस का साहित्य दबिक मिला है। इसके अलावा इनके पास से बम बनाने की कई विधियों से जुड़े मटिरियल भी मिले हैं। लैपटॉप व मोबाइल फोन की पड़ताल की जा रही है। यह भी जानकारी जुटाई जा रही है कि ये कितने लोगों के संपर्क में हैं और किस-किस से चैट करते हैं।
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सिमी से बदली जांच की दिशा
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ट्रेन पलटाने की साजिश की जांच जब कानपुर में हो रही थी तो निरीक्षण के बाद सीबीआई टीम ने स्थानीय अफसरों को जांच की एक नई दिशा दी थी। सूत्रों की मानें तो प्रथम दृष्टया सीबीआई टीम ने इसे लखनऊ में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रैली से पहले बड़ा हादसा करने की कोशिश माना। इस काम को कम से कम चार लोगों द्वारा अंजाम दिए जाने की आशंका जताई गई। माना जा रहा है कि सिमी के स्लीपिंग माड्यूल्स के जरिए किसी आतंकी संगठन की ओर से ऐसा किया गया होगा। सीबीआई टीम ने जब आरपीएफ से उनकी जांच का निष्कर्ष पूछा तो आरपीएफ ने कहा कि इसमें किसी ग्रुप का हाथ है।
-पटरी काटना लोहा चोरों का काम कतई नहीं लगता क्योंकि इसमें काफी वक्त लगता है और ये काम आम आरी से हो भी नहीं सकता। रेलवे की बहुत सी पटरियां जगह-जगह ट्रैक किनारे पड़ी रहती हैं। लोहा ही चुराना होता तो चोर किनारे पड़ी पटरियों पर नजर डालते न कि पटरी काटने जैसा दुश्कर काम करते।
-पैंड्रॉल क्लिप स्लीपरों में बहुत कस के जड़ी होती हैं। हथौड़े या पत्थर से ठोंक-ठोंककर पैंड्रॉल क्लिप निकालने के दौरान काफी आवाज होती है जो दूर तक सुनाई देती है। 31 दिसंबर की रात ट्रैक पर पेट्रोलिंग कर रहे दोनों ट्रैकमैनों ने बताया कि उन्हों कोई आवाज नहीं सुनाई दी। इसका मतलब पैंड्रॉल क्लिप निकालने में विशेषज्ञता बरती गई। ये आम चोरों या अराजकतत्वों का काम नहीं।
- दो से चार व्यक्तियों ने दिया घटना को अंजाम। ट्रैक मैनों को आते देखकर भागे लोगों को किसी ने क्यों नहीं देखा, जबकि उस दिन नए वर्ष की धूमधाम थी। झाड़ियों से उनके भागने पर क्रश्ंिाग (झाड़ियों के टूटने से बना रास्ता) निशानों की पड़ताल क्यों नहीं हुई।