अग्निहोत्र वेद में उल्लेखित प्राण ऊर्जा सिद्धांत पर आधारित विज्ञान है। आदिकाल में प्रदूषण के निवारण के लिए हर घर में अग्निहोत्र होता था। इसमें पिरामिड आकार के तांबे के बर्तन में देसी गाय के गोबर के उपलों को डालकर उसमें देसी गाय के घी में डूबे हुए अक्षत डालने चाहिए। यह प्रक्रिया दो से तीन मिनट की है।
इस काम को दिन में दो बार सूर्योदय और सूर्यास्त के समय करना चाहिए। इस प्रक्रिया में निकलने वाली भस्म को पानी में मिलाकर पौधों में छिड़काव करने से उन्हें कोई रोग नहीं लगेगा। सीएसए में चल रहे भारतीय बागवानी सम्मेलन के तीसरे दिन केंद्रीय उपोष्ण बागवानी संस्थान (सीआईएसएच), लखनऊ के पूर्व निदेशक डॉ. आरके पाठक ने यह दावा किया।
उन्होंने बताया कि अग्निहोत्र से निकलने वाला धुआं कीटाणुओं और बैक्टीरिया को खत्म करता है। उन्होंने बताया कि शोध के दौरान एक कमरे में बैक्टीरिया की स्थिति को जानने के बाद मंत्रोच्चारण के साथ अग्निहोत्र किया तो 90 प्रतिशत बैक्टीरिया कम पाए गए। इस मौके पर डॉ. वाईआर चन्ना, डॉ. वीके त्रिपाठी, डॉ. एचजी प्रकाश, डॉ. खलील खान, डॉ. एके सिंह आदि मौजूद रहे।