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500 की बंदूक, रिन्यूवल फीस 1500, सरेंडर

Mon, 26 Dec 2016 10:54 AM IST
आशुतोष मिश्र / अमर उजाला, कानपुर
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कानपुर के मसवानपुर के 85 वर्षीय शिवस्वरूप ने बारूद भरकर चलाने वाली पुरानी बंदूक (गजियाई बंदूक) का सरेंडर कर दिया है। उनका कहना है कि लाइसेंस बनना बंद होने के बाद अब इस बंदूक की कीमत 500 रुपये भी नहीं रह गई है और रिन्यूवल फीस 1500 हो गई। कौन ढोएगा इसे। इसलिए लाइसेंस और बंदूक सरेंडर कर दी।
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दरअसल अब सरकार ने तीन साल के लिए होने वाले असलहा लाइसेंस के रिन्यूवल की फीस बढ़ाकर 1500 रुपये कर दी है। इससे पहले बंदूक की रिन्यूवल फीस 60, रायफल की 90, रिवाल्वर/पिस्टल की 150 और बारूद वाली बंदूक (गजियाई) की मात्र छह रुपये थी। अब फीस ज्यादा और बंदूक की कीमत कम होने से लोग उसे सरेंडर करना फायदे का सौदा मान रहे हैं। इस समय रोज दो-तीन बंदूकें सरेंडर की जा रही हैं। 

ग्राम पटरी घाटमपुर निवासी महेश बाबू सचान और नौबस्ता के उमाशंकर बाजपेई ने अपनी एक नाली बंदूक सरेंडर कर दी है। यशोदा नगर के शिव मोहन यादव ने अपनी 315 बोर की राइफल और लाइसेंस सरेंडर कर दिया है। सिटी मजिस्ट्रेट आदित्य प्रकाश श्रीवास्तव का कहना है कि लाइसेंस रिन्यूवल कराने के लिए लोग 1500 रुपये खर्च नहीं करना चाह रहे हैं। यही कारण है कि बंदूक सरेंडर होना एकदम से बढ़ गई हैं। इस माह अभी तक 32 बंदूक और लाइसेंस सरेंडर हो चुके हैं।
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क्या होती गजियाई बंदूक
इस बंदूक का चलन काफी समय पहले होता था। करीब दो दशक पहले तक टोपी वाली गजियाई बंदूकों का चलन था। इसे चलाने में कारतूस की जगह बारूद का प्रयोग होता है। बंदूकधारक शस्त्र लाइसेंस की दुकानों से कारतूस की जगह बारूद खरीदते है। फिर नाल में बारूद ठूंस-ठूंस कर भरा जाता है। फिर फायर किया जाता है। अब इसका चलन लगभग बंद हो गया है। 
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