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तोपची गुलाम गौस खान ने मंदिर को बचाकर पीछे छुपी अंग्रेजी सेना के उड़ा दिए थे परखच्चे

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झांसी। महारानी लक्ष्मीबाई द्वारा अंग्रेजों की सत्ता स्वीकार न करने पर ह्यूरोज ने झांसी पर हमला बोल दिया था। झांसी के परिकोटे के सभी दरवाजे अंदर से बंद कर दिए गए थे। बाहर अंग्रेजी सेना किले पर गोले बरसा रही थी तो अंदर से भी जवाब में अंग्रेजों की सेना के कैंप पर गोले बरस रहे थे। रानी के विश्वस्त तोपची गुलाम गौस खां की कड़क बिजली तोप किले की बुर्ज से जो गोले उगल रही थी, उससे अंग्रेजी सेना की हालत खराब हो गई थी। अंग्रेजों ने अपनी रणनीति बदली उन्होंने अपनी सेना के कुछ जवानों के कैंप को जीवनशाह के मैदान से हटाकर सैंयरगेट के पास स्थित मड़िया महादेव मंदिर के पास लगा दिया तथा मंदिर के बगल से ही तेज गोलाबारी शुरू कर दी। अब गौस खां धर्म संकट में फंस गए अगर गोले चलाते हैं तो मंदिर क्षतिग्रस्त होता है , आखिर क्या करें पर महारानी के आदेश के बाद भी उन्होंने गोले नहीं चलाए तथा गौस खां ने अपनी जान पर खेलकर कुछ इस तरकीब से गोले चलाए कि मंदिर सुरक्षित बच गया तथा अंग्रेजी सेना के कैंप में तबाही मच गई। कई तोपें नष्ट हो गई। सात दिन तक चले इस युद्ध में रानी के सबसे विश्वस्त सिपाही बराबर मोर्चे पर डटे रहे पर दूल्हा जी ने जब एक ओर से फाटक खोल दिया तब घायल हो चुके गुलाम गौस खान ने अपने साथियों की मदद से महारानी को झांसी किले से कालपी के लिए रवाना कर दिया । अंतिम समय तक उनकी तोप गोले उगल रही थी, 4 जून 1858 को अंग्रेजी की ओर से आए एक गोले ने गौसखां को गंभीर रूप से घायल कर दिया और उन्होंने कड़क बिजली तोप से ही लिपटकर भारत माता की जय का उद्घोष करते हुए देश के लिए शहादत दे दी। उनकी समाधि झांसी किले के अंदर आज भी उनकी मातृभूमि के प्रति बलिदान की कहानी कहती है।
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झांसी की रानी ने कहा था, हम महादेव से क्षमा मांग लेंगे, पहले मातृभूमि की रक्षा करो
शिक्षा विद् डा. चंद्रभूषण बताते हैं कि बात प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की है उस दौरान झांसी की रानी ने अपनी सेना के अतिरिक्त 1400 सिपाहियों की एक अलग से ब्रिगेड का गठन किया था। इसके कमांडर थे तोपची गुलाम गौस खान। इनकी टीम में खुदाबक्श, काशी बाई, लाल भाऊ बख्शी, मोतीबाई, दीवान रघुनाथ सिंह, दीवान जवाहर सिंह जैसे जांबाज लड़ाके भी शामिल थे। अंग्रेजी सेना ने झांसी के किले पर हमला कर दिया, दो सप्ताह तक युद्ध चला पर गुलाम गौस की कड़क बिजली तोप जो गोले उगल रही थी उससे अंग्रेजी सेना को भारी नुकसान हो रहा था। ह्यूरोज ने अपनी रणनीति बदली खंडाराव गेट के बाहर से जीवन शाह चौराहे तक के अपनी सैनिक टुकड़ियों के कैंप में से कुछ को सैंयर गेट के बाहर गोविंद चौराहे की ओर मड़िया महादेव मंदिर के पास तैनात कर दिया तथा यहीं से गोलाबारी शुरू कर दी। गुलाम गौस खां ने जैसे ही अपनी तोप घुमाई तो वे धर्म संकट में फंस गए, सामने मड़िया महादेव पड़ रहा था। उन्होंने महारानी लक्ष्मीबाई को बताया कि वह गोला नहीं चला सकते हैं, क्योंकि सामने महादेव मंदिर आ रहा है, अगर इधर से गोलाबारी करते हैं तो मंदिर क्षतिग्रस्त होने का खतरा है, महारानी ने कहा गौस हम महादेव से माफी मांगकर प्रायश्चित कर लेंगे, जो थोड़ा बहुत हिस्सा क्षतिग्रस्त भी होगा उसका पुनर्निर्माण करवा देंगे, अभी मंदिर से अधिक मातृभूमि की रक्षा जरूरी है। पर, गौस खान ने ऐसा नहीं किया उन्होंने अपनी ब्रिगेड के दूसरे साथियों को बुलाया तथा बड़े रस्सों का सहारा लेकर तोप में गोले दागने से पहले उसे इस तरह से कसकर रखा कि गोले मंदिर के बगल से अंग्रेजों के कैंप पर गिरे रहे थे तथा मंदिर बचने के साथ ही दुश्मनों के खेमे में तबाही मच गई। पर, दूल्हा जू ने एक ओर का गेट खोल दिया तथा अंग्रेज सेना परिकोटे के अंदर आ गई तथा उन्होंने झांसी को तहस नहस कर दिया और इसी युद्ध में गौस खां शहीद हो गए।
युद्ध में दोस्त खान, खुदाबक्श, काशी बाई, लाल भाऊ, मोतीबाई, दीवान रघुनाथ सिंह, जवाहर सिंह भी हुए थे शहीद
शिक्षा विद् अशोक यादव बताते हैं कि इस युद्ध में न केवल गौस खां बल्कि उनकी ब्रिगेड के दोस्त खान, खुदाबक्श, काशी बाई, लाल भाऊ बख्शी, मोतीबाई, दीवान रघुनाथ सिंह, दीवान जवाहर सिंह समेत 1400 सिपाही शहीद हुए थे। अगर दूल्हा जू झांसी नगर का दरवाजा न खोलता तो शायद अंग्रेज झांसी से पराजित होकर लौटती।
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