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जमाना बदला लेकिन नहीं बदला डब्बा का बब्बा

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झांसी। बुंदेलखंड में सावन माह में सावनी देने की परंपरा काफी पुरानी है। रक्षाबंधन से ठीक पहले ससुराल पक्ष के लोग अपनी नई बहू के मायके में सावनी भेजते हैं। इसमें लकड़ी के सोटा, चपेटा, चकरी, भौंरा सहित कई खिलौने और शक्कर की खरपुड़ी आदि होती हैं। साथ ही सफेद दाढ़ी और लाल चोंगा पहने डब्बा का बब्बा भी होता है। जिसे कई लोग समधी का प्रतीक भी मानते हैं। कहा जाता है कि कई साल गुजर गए लेकिन डब्बा के बब्बा में कोई अंतर नहीं आया।
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बुंदेलखंड में लगभग सभी त्योहारों से जुड़ी परंपराएं प्रचलित हैं। इनमें रक्षा बंधन से ठीक पहले सावनी भेजने की भी परंपरा प्रमुख है। इसे ससुराल पक्ष के लोग अपनी बहू के मायके में भेजते हैं। इसके जरिये ही पहचान होती थी कि जिस घर में अपनी बेटी की शादी की है वह कितना समृद्ध है। सावनी में कई खिलौने रखे जाते हैं। इनमें दाढ़ी लगाए और चोंगा पहने बब्बा, लकड़ी, मिट्टी अथवा लाख से बने चपेटा लकड़ी की चकरी, भौंरा, बांसुरी, अलगोजा, समधिन की प्रतीक गुड़िया, गुलटेना पेड़ की लकड़ी से तैयार रंग बिरंगे सौटा आदि रहता है। चपेटा 5 व 11 की संख्या में रहता है। डब्बा का बब्बा जिसे कई लोग समधी का रूप मानते है सावनी में मुख्य माना जाता है। इन्हें जेवरात कपड़ा, रंग बिरंगे कलश, मिठाई के साथ भेजा जाता है। सावनी को घर के आंगन में रखा जाता है जिसे सभी लोग देखते है। इसके बाद बदले में मायके पक्ष के लोग भादो माह की मौर छठ पर मौराई छठ के रूप में उसे भेजते है। यह परंपरा आज भी गांवों तथा शहर के कई परिवारों में प्रचलित है। हालांकि शहरों में यह परंपरा धीरे-धीरे लुप्त होती जा रही है।
अब सिमट गई हैं सावनी की दुकानें
सावन का महीना शुरू होते ही महानगर के बिसाती बाजार में कभी सावनी के खिलौने बेचने की दुकानें 12 से अधिक लगती थीं। लेकिन बदलते जमाने के साथ और पुरानी परंपराओं में लोगों की दिलचस्पी न लेने के कारण वर्तमान में यह दुकानें 2 से 4 तक ही सिमट कर रह गई। सावनी विक्रेता बृजेश के अनुसार करीब आठ साल पहले तक सावनी खरीदने वालों की भीड़ होती थी। बाजार देर रात तक गुलजार रहता था। लेकिन अब यह सब नहीं दिखता। इसके अलावा बच्चे रिमोट से चलने वाले आधुनिक खिलौने ही मांगा करते हैं। कई परिवार तो खानापूर्ति करने के लिए ही सावनी के परंपरागत खिलौने खरीद लेते हैं। इसके अलावा मिट्टी से बनने वाले रंग-बिरंगे कलश भी बहुत कम देखने को मिलते हैं।
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गाये जाते हैं समृद्धि के गीत
बुंदेलखंड में सावनी आने के बाद बुंदेली भाषा में राछरा व कजरिया गीत भी गाए जाते हैं। इसमें भगवान से प्रार्थना जाती है कि जिस तरह से ससुराल के गांव में बरसात हो रही हैए इसी प्रकार से उनके भाई के गांव मेें भी बरसात हो। ताकि समृद्धि बनी रहे और फसल अच्छी हो।
बुंदेलखंड में सावनी भेजनी की परंपरा काफी पुरानी हैं। यह वर व वधू पक्ष के परिवारों में आपसी संबंधों को काफी मजबूत व मधुर कराती है। पन्नालाल असर वरिष्ठ साहित्यकार व बुंदेली संस्कृति के जानकार
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