झांसी। पौराणिक मत के अनुसार बुंदेलखंड के कालाजार पहाड़ जो बाद में कालिंजर के नाम से जाना गया इसी स्थान पर आज भी शिवजी तथा पार्वती जी की मूर्ति पर सदैव जल गिरता रहता है। विजय दशमी पर नीलकंठ के दर्शन करने की परंपरा के पीछे बुंदेलखंड में एक कहानी सुनाई जाती है, जो कि समुद्र मंथन के काल की है। कहा जाता है कि जब शिवजी ने विषपान किया तो वह जहर की जलन से पीड़ित हो गए, उन्होंने पहले ऋषिकेश में विष के प्रभाव को कम करने के लिए समाधि ली, पर हरेभरे क्षेत्र में विष का शमन करने से प्रकृति पर प्रभाव पड़ सकता था, इस कारण वह बुंदेलखंड के दण्डकारण्य क्षेत्र से लगे कालाजार पहाड़ पर आए तथा यही पर उन्होंने विष का शमन किया। पार्वती जी ने उनका गला दबा लिया था इस कारण जहर गले से नीचे नहीं उतर पाया तथा उनका कंठ नीला पड़ गया था। भगवान ने भक्तों को यहां नीलकंठ के रूप में दर्शन दिए इस कारण इस क्षेत्र का नाम नील कंठेश्वर पड़ गया। जिस समय भगवान ने इस पहाड़ पर विष का शमन किया तो प्रकृति में हलचल मच गई, पशु पक्षी बेचैन हो गए, तब भगवान शिव ने पशु पक्षियों के बीच नीलकंठ के रूप में दर्शन देकर उन्हें राहत दी थी। भगवान शिव ने विजय दशमी के दिन विषपान किया था इस कारण बुंदेलखंड के कालाजार पहाड़ जो कालांतर में कालिंजर के रूप में जाना गया यहां स्थित नीलकंठेश्वर मंदिर से ही दशहरे पर नीलकंठ के दर्शनों की परंपरा का सूत्रपात हुआ। नीलकंठेश्वर के दो ही मंदिरों पुराणों में वर्णन है पहला ऋषिकेश में तथा दूसरा बुंदेलखंड के कालाजार पहाड़ (कालिंजर) में है।
भगवान शिव के नीलकंठ अवतार का शिव व स्कंद पुराण में है वर्णन
साहित्यकार अजित पुरोहित बताते हैं कि दशहरे पर नीलकंठ के दर्शन की परंपरा का सूत्रपात बुंदेलखंड के कालिंजर से ही हुआ है। यहां पर प्राचीन नीलकंठ मंदिर है इसमें शिव व पार्वती की मूर्ति स्वप्रतिष्ठित बताई जाती है। भगवान के नीलकंठ अवतार की कथा का वर्णन शिवपुराण व स्कंद पुराण में मिलता है। समुद्र मंथन के बाद जब शिवजी ने विषपान किया तो उन्हें जलन होने लगी, पार्वती जी ने उनका गला दवा लिया था जिससे जहर शरीर में नीचे न उतरे। सबसे पहले ऋषिकेश में उन्होंने समाधि लगाकर जहर के शमन का प्रयास किया पर वहां जहर का समन करने पर हरभरी प्रकृति प्रभावित हो सकती थी, इसलिए पथरीले क्षेत्र दंडकारण्य से लगे हुए कालाजार पहाड़ पर (कालिंजर) पर आकर पथरीले क्षेत्र में शिवजी ने अपने जहर का शमन किया था। प्रकृति में हलचल से परेशान पशु पक्षियों को शांत करने के लिए भगवान ने स्वयं नीलकंठ अवतार लिया था। इसके बाद इसी स्थान पर वह समाधिस्थ हो गए तथा मां पार्वती उनकी सेवा में लग गईं। जहर से राहत के लिए उनके शीश पर जलधारा गिर रही है जो अब भी जारी है।
किले और गढ़ियों में होता है शस्त्र पूजन, खिलाया जाता है वीरा
इतिहासकार डा. विजय कुशवाहा बताते हैं कि बुंदेलखंड की पूर्व रियासतों में आज भी पूर्व नरेश (राजा) अपनी गढ़ी तथा किलों में दशहरे पर शस्त्र पूजन करते हैं तथा शाम के समय जनता के साथ वीरा (पान) के आदान- प्रदान की परंपरा है। यह परंपरा सदियों पुरानी है। वीरा का अर्थ वीरता से है। पहले रियासतों में दशहरे पर दंगल और तलवारबाजी होती थी, उस समय वीरता दिखाने वालों को रियासत के राजा अपने हाथ से वीरा (पान) खिलाते थे। हालांकि, वक्त के साथ अब यह परंपरा भी महज औपचारिकता रह गई।
मछली देखने की परंपरा
कुशवाहा बताते हैं कि भगवान के दस अवतारों में मत्स्य अवतार का भी वर्णन है, इस कारण ऐसा माना जाता है कि महिषासुर के वध करने वाली मां विजया तथा रावण का वध करने वाले श्रीराम की विजय पर दशहरे के दिन सभी संकटों से मुक्त रहने के लिए लोग भगवान के प्रथम अवतार मत्स्य के दर्शनों को शुभ मानते हैं।
दशहरे पर परंपराओं के नाम थी ये कुरीतियां, भैंसे का किया जाता था वध
अजित पुरोहित बताते हैं बुंदेलखंड में आजादी के पहले तक दशहरे के नाम पर जो परंपराएं थीं, उनको सरकार काफी प्रयास करके रोक सकी है। यहां के ऐतिहासिक नगर गढ़कुंडार व दतिया में भैंसा को एक मैदान में छोड़कर उसका तलवारों से वध किया जाता था। जब वह भैंसा मर जाता था तो उसके मांस को प्रसाद के रूप में लोगों को बांटा जाता था। पर, 1947 के बाद जब रियासतों का विलय हो गया, तब वीरसिंह जू देव द्वितीय ने इस जीव हत्या वाली परंपरा को दोनों जगह बंद करवा दिया था।
जंगली जानवरों का किया जाता था शिकार
बुंदेलखंड में सामंत दशहरे को वीरता का पर्व मानते थे। इसी कारण वह दशहरे वाली रात को पूरे लावलश्कर के साथ जंगल में शिकार करने निकलते थे तथा जंगली जानवरों का शिकार करते थे। पर, आजादी के बाद इस कुरीति पर भी वन्य जीव संरक्षण कानून बनने के बाद काफी हद तक रोक लग गई है।