झांसी। कलम, कटार कृपाण और कला की कर्मस्थली बुंदेली भूमि का इतिहास अनेक रणबांकुरों की तलवार की धार से लिखा गया है। गढ़कुंडार में प्रथम बुंदेला नरेश सोहन पाल बुंदेला के वंशज रुद्रप्रताप ने ओरछा में अपनी राजधानी स्थापित की। तीसरे पुत्र उदयादित्य जो नुना महेवा के जागीरदार थे, उनके वंशज चंपतराय के चौथे पुत्र का नाम छत्रसाल था। छत्रसाल के पिता चंपत राय और स्वयं छत्रसाल बुंदेलखंड के प्रतापी राजाओं में गिने जाते रहे हैं। इसीलिए बुंदेलखंड में कहा जाता है, इत जमुना उत नर्वदा, इत चंबल उस टौेंस छत्रसाल से लड़न की रहू न काहू हौंस। जब पूरे बुंदेलखंड में छत्रसाल का परचम फहरा रहा था उस समय किसी की भी हिम्मत नहीं थी जो बुंदेलखंड पर आक्रमण कर सके। महाराज छत्रसाल के बारे में कहा जाता हैं कि ‘छत्ता तोरे राज्य में धक-धक धरती होय। जित-जित घोड़ा मुख करे तित-तित फ त्ते होय।।’ छत्रसाल के राज्य में आने में मुगल कांपते थे। वे अपने पूरे जीवन काल में मुगलों को अपनी वीरता से छकाते रहे।
शाहजहां की सेना चंपत राय को घेरे थी उसी दौरान हुआ था छत्रसाल का जन्म
उनके जन्म के बारे में मध्य प्रदेश के पन्ना राज्य के गजेटियर में यह कहा गया है कि ज्येष्ठ सुदी तिथि तीज शुक्रवार को छत्रसाल का जन्म हुआ था। कम लोगों को यह जानकारी होगी कि जिस समय शाहजहां की सेना चंपतराय को चारों तरफ से घेरे थी और वे निर्वासित जीवन व्यतीत कर रहे थे। उस समय 4 मई सन् 1649 ई. में शुक्रवार के दिन टीकमगढ़ म.प्र. के गांव नुना महेवा की मोर पहाड़ी पर कुंवर छत्रसाल का जन्म रानी लालकुं वर की कोख से हुआ था।
छत्रसाल के माता-पिता ने कटार मारकर एक साथ त्यागे थे प्राण
तब कौन जानता था कि बुंदेला सुत छत्रसाल के मां-बाप उन्हें 12 वर्ष की आयु में तलवारों की खनखनाहट के बीच देशहित में छोड़कर इस दुनिया से चले जाएंगे। छत्रसाल के ऊपर लिखे गए प्रमुख ग्रंथ छत्र प्रकाश में वर्णित है कि जब सन् 1661 ई. में ग्राम सहरा गांव के इन्द्रमणि धंधेरे के यहां छत्रसाल के पिता शरण लिए हुए थे तो उन्होंने उनसे दगा कर मुगलों से मिलकर सूचना दे दी थी। जब मुगलों ने चंपत राय को घेर लिया और राजा और रानी ने यह देखा कि अब वे नहीं बचेंगे तो उन्होंने यह निश्चय करके प्राण त्यागे कि मुगल सेना उनके जिंदा शरीर को छू न पाए इसलिए रानी और राजा ने कटार मारकर एक साथ प्राण त्याग दिए थे। छत्र प्रकाश में वर्णन आया है, ऐसो समौ लखौ ठकरानी, पतिव्रत मांध चलायौ पानी, चुटकि तुरग पति के ठिंग जा ही, धरी बाग इक वीर सिपाही। बाग छुअन पाई नहीं, चढ़यो मरन को चाव कटार काढ़ौ पेट में दये घाव पे घाव।। दै दै घाव मरी ठकुरानी, चंपतराय दगा तब जानी यह संसार तुच्छ निर्दयी, मार कटारन उदर विदारौ। महाराज छत्रसाल का जीवन अत्यंत गंभीर व कठिन संघर्ष पूर्ण परिस्थितियों में अपने सगे भाई अंगद सिंह राय के पास देवगढ़ में बीता। उन दिनों देवगढ़ में बखत बलचंद गौड़ राजा राज्य करते थे। उनसे छत्रसाल ने अपने पिता के साथ धंधेरे के विश्वासघात का पूरा किस्सा बखान किया। इस प्रकार मरे हुए पिता का का सिर काटकर धंधेरे ने मुगलों के सामने पेश किया तभी से छत्रसाल ने मुगलों व धंधेरों से बदला लेने का प्रण ले लिया।
शिवाजी ने दी थी देवी जी की सिद्ध तलवार
छत्रसाल शिवाजी से मिलने सतारा पहुंचे। शिवाजी उनके आगमन से बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने छत्रसाल को एक देवी जी की सिद्ध तलवार जिस पर भवानी लिखा था उनकी कमर में बांधकर अपने गुरुदेव समर्थ गुरु रामदास द्वारा उनका तिलक कराकर उन्हें नरेश की उपाधि दी। छत्रपति नाम की यह तलवार आज भी पन्ना नरेश के कोषागार में सुरक्षित है। शिवाजी के संरक्षण में छत्रसाल को अधिक संबल मिला और वे मुगलों से अकेले जूझने में समर्थ हो गए, उनका आशीर्वाद प्राप्त कर सन 1671 ई. में कुछ घुड़सवार और कुछ पैदल सैनिकों सहित उन्होंने मालवा को जीतकर पूरे बुंदेलखंड पर अपनी सेना का कब्जा किया और जहां तक उनका राज्य स्थापित हुआ जिसके बारे में प्रसिद्ध वियोगी हरि लिखते हैं, इत जमुना उत नर्वदा, इत चम्बल उस टोंस छत्रसाल से लड़न की रहू न काहू हंौंस।
इन्होंने अपनी रियासत की राजधानी पन्ना में स्थापित की। कहा जाता है कि उनके गुरू प्राणनाथ ने उन्हें पन्ना में हीरे जवाहरात की खान बताई थी ताकि वह अपनी सेना का विस्तार कर सके। छत्रसाल ने 20 वर्ष तक विशाल सेना खड़ी करके मुगलों को धूल चटा दी। आज भी पन्ना की खदान से हीरे निकाले जा रहे हैं। उनका राज्य सागर, धामौनी, जबलपुर, मंडला, भेलसा, सिरोज, सीधी, भोपाल और सिहोर तक था तथा बघेलखंड में उनकी धाक विन्ध्यवासिनी के मंदिर के तक थी। छत्रपाल ने औरंगजेब को पूरी जिंदगी भर छकाया पर वे उनसे पार न पा सके। अपने वृद्धावस्था में आखिरी बार सन 1721 ई. में बादशाह ने इलाहाबाद के सूबेदार बंगस को छत्रसाल का दमन करने हेतु भेजा। वह कालपी के समीप भोगनीपुर से बांदा, महोबा होते हुए आया और उसने छत्रसाल को जैतपुर के किले में जाकर घेर लिया भयानक युद्ध हुआ जब छत्रसाल ने देखा कि वे घिर गए हैं तो उन्होंने मराठा राजा पेशवा बाजी राव को एक भावुक पत्र लिखा जिसका दोहा इतिहास में प्रसिद्ध है,
जो गति भई गजेंद्र की सो गति भई है आज बाजी जात बुंदेल की राखो बाजी लाज। पेशवा बाजी राव ने 25000 घुड़सवार और तमाम सेना लेकर जैतपुर पहुंचकर बंगस को खदेड़ दिया। महाराज छत्रसाल ने अपने विजय का जश्न मनाया पेशवा बाजीराव को सम्मान सहित बुलवाया और उन्हें अपना तीसरा पुत्र मानते हुए आज के सागर (म.प्र.) झांसी, जालौन का राज्य तिलक कर दे दिया और अपने राज्य की प्रसिद्ध नृत्यांगना मस्तानी को भी भेंट किया जो बहुत ही बहादुर थी जिनके पुत्रों ने बाद में बांदा के नवाबों के नाम से अंग्रेजों से लोहा लिया। उन्होंने अपनी छतरपुर नगर बसाया ।