झांसी। मातृ एवं बाल मृत्यु दर को कम करने के लिए सरकार की ओर से तमाम योजनाएं चलाई जा रही हैं। सरकारी अस्पतालों में जांचों से लेकर टीके तक नि:शुल्क लगाए जा रहे हैं। इसके बावजूद जिले की कई गर्भवती महिलाएं न तो जरूरी टीके लगवाती हैं और न ही अहम जांच करवाती हैं।
गर्भावस्था के समय जरा सी लापरवाही बरतना मां और बच्चे दोनों के लिए खतरनाक हो सकता है। गर्भवती महिला को खतरे से बचाने के लिए हेपेटाइटिस-बी, एचआईवी, सिफलिस, ब्लड ग्रुप, शुगर, थायरायड जांचें गर्भवती महिलाओं के लिए अनिवार्य की गई हैं। साथ ही टिटनेस व अन्य टीके भी लगवाने आवश्यक हैं। तमाम कार्यक्रमों के बावजूद गर्भवती महिलाओं में इसको लेकर जागरूकता नहीं आ रही है। आंकड़ों को देखें तो वर्ष 2020-21 में 47624 गर्भवती महिलाओं में 43380 को टिटनेस का पहला और 38528 को दूसरा टीका लगा है। इनमें से 36395 गर्भवती महिलाओं ने ही प्रसव से पहले होने वाली चार जांचों को कराया। आधे से भी कम यानी 21288 गर्भवती महिलाओं की एचआईवी की जांच हुई।
जेएसवाई में मिलती आर्थिक मदद
गर्भवती महिलाओं में संस्थागत प्रसव को बढ़ावा देकर मातृ एवं नवजात मृत्यु दर को कम करने के लिए जननी सुरक्षा योजना चलाई जा रही है। यह योजना सभी शहरी और ग्रामीण इलाके में आशा कार्यकर्ता के जरिए चलाई जाती है। इसके तहत सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों, जिला या राज्य अस्पताल में प्रसव कराने वाली गर्भवती महिलाओं को डिलीवरी के बाद देखभाल के साथ नकद सहायता दी जाती है। शहरी क्षेत्र में 1400 रुपये मिलते हैं। इसमें आशा कार्यकर्ता को 400 रुपये डिलीवरी भत्ता दिया जाता है। वहीं, ग्रामीण इलाके में 2000 रुपये मिलते हैं, जिसमें 600 रुपये आशा कार्यकर्ता को मिलते हैं।
तीन साल में आठ प्रतिशत बढ़े संस्थागत प्रसव
एसीएमओ डॉ. एनके जैन ने बताया कि सुरक्षित मातृत्व एवं स्वस्थ नवजात के लिए संस्थागत प्रसव बेहद जरूरी है। इस कारण पिछले तीन साल में जनपद में संस्थागत प्रसव के आंकड़ों में बढ़ोतरी हुई। नेशनल फेमिली हेल्थ सर्वे-5 की रिपोर्ट के अनुसार जिले में अब आठ प्रतिशत बढ़कर 92.9 फीसदी हो गया है।