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त्योहार तो मन गया, अब लौटने की राह मुश्किल

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झांसी। त्योहारी सीजन में ट्रेनों में सीट मिल पाना बेहद मुश्किल बना हुआ है। अब दिवाली मनाने के बाद दूसरे शहरों में काम करने वाले कई लोगों के लौटने की राह मुश्किल हो गई है। जो लोग समय पर टिकट नहीं बनवा पाए, वो शनिवार को तत्काल में आरक्षण कराने के लिए मशक्कत करते रहे। दूसरा यात्री वीआईपी कोटे से सीट कंफर्म पाने की जुगाड़ करने में लगे हैं। इसकी वजह से रेलवे अधिकारियों और कर्मचारियों को काम करने में परेशानी हो रही है।
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शहर क्षेत्र की द्वारिका पुरी कॉलोनी में रहने वाले सत्येंद्र श्रीवास्तव के बेटे पंकज को रविवार को पुणे जाना है। शनिवार को सत्येंद्र तत्काल टिकट बनवाने के लिए सुबह सात बजे आरक्षण कार्यालय पहुंचकर कतार में लग गए। कतार में उनका सातवां नंबर था। सुबह 9.30 बजे तत्काल टोकन बंटने के ठीक पहले महिलाओं ने भी अपनी एक अलग लाइन लगा ली। टोकन बंटने पर उनको एक नंबर खिड़की पर छह नंबर टोकन दिया गया। मगर, उनकी बारी आते-आते झेलम एक्सप्रेस में बर्थ खत्म हो गई। इससे उनका टिकट नहीं बन सका। तत्काल टिकट पूरे हो जाने से कई यात्रियों को मायूस होकर लौटना पड़ा।
वहीं, हर ट्रेन में ड्यूटी पर जाने वाले अधिकारी, कर्मचारी, सांसद और मंत्री का वीआईपी कोटा होता है। जब ट्रेन में इस कोटे की कुछ सीटें खाली होती हैं, तब रेल प्रशासन इस खाली सीटों को जरूरतमंद यात्रियों के लिए रिजर्व कर देता है। यानी आम जनता को सीट न मिलने पर ये सीट दे दी जाती हैं। अगर रेलवे की ओर से कोटा आवंटित नहीं किया जाता है तो आरक्षण चार्ट बनाने पर वेटिंग वाले यात्री को ये सीट दे दी जाती है। स्थानीय ज्यादातर यात्री ऐसे हैं जो सांसद, मंत्री या रेलवे अधिकारियों के परिचित हैं। सभी यात्री जुगाड़ कर ट्रेन में सीट रिजर्व कराने का प्रयास कर रहे हैं। वैसे तो वीआईपी कोटे में प्रत्येक ट्रेन के हिसाब से दो से पांच सीटें होती हैं। लेकिन इस समय वीआईपी कोटे में सीट पाने के लिए हर चिह्नित ट्रेन में 15 से 20 आवेदन आ रहे हैं।
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